दोपहर का वक्त था। कमरे में हल्की-हल्की गरमी थी लेकिन पंखे की हवा मेरी नग्न जांघों को सहला रही थी। मैं अकेली थी, सिर्फ एक ढीली सी नाइटी पहने—नीचे कुछ भी नहीं, न ब्रा, न पैंटी। नाइटी की पतली कपड़े की परत से मेरे नर्म, भारी स्तनों की हलचल झाँक रही थी। मैं बिस्तर पर अधलेटी, मोबाइल पर स्क्रॉल कर रही थी, जब दरवाज़े की घंटी बजी।
मैंने उठते हुए ज़रा सा खिंचाव महसूस किया, नाइटी मेरी जांघों से सरकती हुई नीचे गिरने को थी। दरवाज़े पर पहुँची तो देखा, एक दुबला-पतला लेकिन कसा हुआ लड़का ब्रा का डिब्बा लिए खड़ा था—वही जो मैंने ऑनलाइन मंगाई थी।
"मैम, आपकी डिलीवरी," वो बोला, आँखें मेरी गीली गर्दन से लेकर छाती पर झुकी हुईं।
मैंने मुस्कराते हुए डिब्बा लिया और बोली, “चेक तो करना पड़ेगा ना… अंदर आओ, मैं पहन के देख लेती हूँ।”
मैंने दरवाज़ा बंद किया, और उसकी आँखों के सामने ही अपनी नाइटी एक झटके में उतार दी। अब मैं बिल्कुल नंगी खड़ी थी, उसके सामने। उसकी साँसें तेज़ हो गईं।
“भाभीजी… ये क्या…?”
“चेक कर रही हूँ,” मैंने कहा, और ब्रा को खोलकर अपने भारी, उभारों पर चढ़ाने लगी। थोड़ी टाइट थी… “ज़रा हुक लगा दो,” मैंने कहा, पीठ उसकी तरफ करते हुए।
जैसे ही वो पास आया, उसका लंड मेरी नंगी कमर को छूता चला गया—सख़्त, थरथराता हुआ। उसने हाथ काँपते हुए हुक लगाए, और तभी टक—ब्रा फट गई, और मेरे दोनों उफनते हुए स्तन उसके हाथों में समा गए।
उसके हाथ खुद-ब-खुद उन्हें दबाने लगे, गूंधने लगे, जैसे वो पल का इंतज़ार ही कर रहा हो। मैंने भी जवाब में उसका लंड अपनी हथेली में ले लिया—गरम, थरथराता, और इतना लंबा कि मुट्ठी में पूरा नहीं आ रहा था। मेरी उंगलियाँ उसे रगड़ने लगीं, और वो पीछे से मेरी गर्दन पर चुम्बन करने लगा, गीले होंठ, गरम साँसें।
मैंने उसके जीन्स का बटन खोला, चड्डी नीचे खींची—और सामने था उसका 10 इंच का ठोस, नसों से भरा लंड। मैंने तुरंत ही झुककर उसे अपने मुँह में ले लिया, गले तक।
"आहह… भाभीजी…" वो कराह उठा।
मैंने दस मिनट तक उसे चूसा, कभी धीमे, कभी तेज़, कभी उसकी नोक पर जीभ फेरती, कभी पूरे लंड को गले के अंदर गटकती। उसका हाथ मेरे बालों में था, मुझे और अंदर भरने के लिए।
फिर उसने मुझे उठाया, दीवार से टिकाया और अपनी जीभ मेरी गीली, थरथराती चूत पर फेरने लगा—धीरे-धीरे, होंठों को चूसता, जीभ से मेरे रस को पीता रहा। मैं हाँफती रही, जांघें काँपती रहीं, और मैं उसके सिर को अपनी जाँघों से दबाती रही।
जब मैं चरम पर पहुँचने ही वाली थी, उसने खुद को खड़ा किया, मेरा एक पैर उठाया और अपनी लंड मेरी चूत के मुँह पर रगड़कर भीतर ठेल दिया—एक ही झटके में पूरा।
"आआआह्ह्ह…!" मैंने चीख के कहा, मेरी पीठ दीवार से लगी, एक हाथ उसके कंधे पर, दूसरा अपने स्तनों को सहलाता।
उसने मुझे उसी हालत में चोदना शुरू कर दिया, दीवार से टिकाकर, धक्का दर धक्का, उसकी हर थ्रस्ट मेरी रूह तक जा रही थी।
फिर उसने मुझे सोफ़े पर झुकाया, मेरी पीठ झुकाकर मुझे घोड़ी बना दिया। उसके लंड ने मेरे भीतर पीछे से भरना शुरू किया, और हर बार वो इतनी गहराई तक जाता जैसे मेरी आत्मा चाट रहा हो। उसके लंड की थापें, उसके अंडकोष की थपकी, उसकी हथेली मेरे कूल्हों पर—सबकुछ मुझे और जला रहा था।
“आ और जोर से… और…” मैं चिल्लाई, और वो झपाटे मारता गया, मेरी चूत को पानी-पानी करता।
करीब 20 मिनट तक लगातार चोदने के बाद, उसकी साँसें तेज़ हुईं, थ्रस्ट तेज़, और फिर उसने अपना गरम वीर्य मेरी चूत के भीतर उँडेल दिया—थप थप की आवाज़ के साथ।
हम दोनों हाँफते हुए अलग हुए। उसने अपने कपड़े पहने, थोड़ा हिचकिचाया, तब मैंने मुस्कराकर कहा, “ये ब्रा तो फट गई… अब एक और मँगानी पड़ेगी। अगली डिलीवरी भी तुम ही लाओगे, समझे…?”
उसके चेहरे पर हँसी और डर का अजीब सा मेल था, लेकिन उसकी आँखें कह रही थीं—वो ज़रूर आएगा।
कामिनी के नाम आपकी पाती
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