बाथरूम की दीवारों पर भाप की चादर पसरी हुई थी। शीशा पूरी तरह धुंधला, और उस पार, पानी की धीमी लहरों के बीच मैं अपने पैर फैलाए, नंगी पीठ से टब के किनारे को सटा कर, अपनी दो उंगलियाँ अपनी ही चूत में गहराई तक डुबो रही थी।
“आह्ह… ह्म्म…” मेरी सांसें भारी थीं, होंठों से अधखुली आहें फिसल रही थीं। हर बार जब मैं अपनी उंगलियाँ अंदर ले जाती, मेरी देह हल्की सी सिहरती, छाती की गोलाइयाँ पानी के ऊपर उभरी हुईं, और निपल्स सख्त।
मेरे ठीक सामने बाथरूम की खिड़की खुली थी — पर्दा हल्के से हवा में हिल रहा था। मैं पूरी तरह खो गई थी — पानी की हर लहर मेरी जाँघों से टकराती, और मेरे अंदर की हर हरकत उस सुख को और तेज़ कर देती।
मैं अपनी ही दुनिया में थी — अपनी ही साँसों की लय में, उँगलियों के नीचे मचलती अपनी चूत की धड़कन में — मुझे पता ही नहीं चला कि कोई देख रहा है, कोई पास आ गया है।
टब में मैं अपनी दो उंगलियों को इतनी तेज़ी से चोद रही थी कि पानी छलकने लगा। मेरे चेहरे पर मदहोशी थी, होंठ काटे हुए, और कूल्हे धीरे-धीरे ऊपर उठ रहे थे जैसे किसी अनदेखे लंड की तलाश में हों।
मेरे होंठों से निकलती कराहें बाथरूम की दीवारों में गूँज रही थीं। मैं आँखें बंद करके बस उसी सुख में खोई रही।
और तभी — अचानक —
“फ्र्र्र्र्र्र्र्श्श्श्श!!”
जैसे ही रवि का वीर्य मेरे चेहरे पर गिरा, गर्म और चिपचिपा, मेरी साँसें रुक गईं एक पल को। माथे से होते हुए एक मोटी धार मेरे नाक की पुल से फिसलकर होठों तक आई — जीभ बाहर निकली तो स्वाद गरम, नमकीन और मर्दाना था।
वो वहीं खड़ा था, लंड हाथ में — मोटा, लंबा, दस इंच का, और अब भी सख्त जैसे फटने को तैयार हो। उसकी आँखें मेरे चेहरे पर बिखरे उसके वीर्य की बूँदों पर थीं… और मैं मुस्कराई, अपने ही उंगलियों से अपने गाल से वीर्य समेटकर जीभ पर ले आई।
“हरामी…” मैंने फुसफुसाया, फिर उसे झटके से पकड़ के खींच लिया, टब के भीतर।
वो जैसे ही अंदर आया, पानी के छींटे उड़े — उसकी छाती मेरे सीने से लगी, और नीचे उसका गरम लंड मेरी जांघों से रगड़ खाता हुआ मेरे चूत के दरवाज़े पर आया।
मैंने खुद को उसकी गोद में बिठाया — अपने पैर टब की दोनों तरफ टिका दिए, और धीरे-धीरे, उसकी आँखों में देखते हुए, अपना हाथ उसके लंड पर रखा।
“ये भरने वाला है मुझे आज… पूरा…”
मैंने उसका लंड पकड़कर अपनी चूत के होंठों पर रगड़ा — गाढ़ा रस मेरे अंदर से बाहर रिस रहा था, लंड की टिप जैसे ही मेरे खुले गीले दरवाज़े से टकराई, मेरा पूरा बदन सिहर गया।
धीरे-धीरे मैंने अपनी कमर नीचे की —
“आह्ह्ह… ह्ह्ह्ह्ह… ओह्ह्ह माई गॉड…”
उसका दस इंच का लंड मेरी चूत में घुस रहा था, हर इंच के साथ मेरा पेट कसता जा रहा था, और जब पूरा लंड मेरे अंदर समा गया — मुझे लगा जैसे मेरा गर्भाशय तक भर गया।
उसने मेरी कमर दोनों हाथों से कस कर थाम ली — “कमीनी… कितनी टाइट है तू…”
“तेरा लंड… उफ्फ्फ… हाँ… अंदर तक लग रहा है…”
वो नीचे से झटके मारने लगा, पानी चारों तरफ छलक रहा था। मेरा बदन हर थ्रस्ट पर उछलता — उसके लंड की मोटाई मेरे अंदर की दीवारों को रगड़ रही थी जैसे वो चीर कर रास्ता बना रहा हो।
"झप… झप… झप… झप!" — उसके लंड की हर भराई पर मेरी चूत के अंदर से आवाज़ें निकल रही थीं, पानी और रस की मिलावट में जैसे बदन का संगीत बज रहा हो।
मैंने उसकी गर्दन पर झुककर होंठ काटे — "और दे… हाँ… ऐसे ही… फाड़ मेरी चूत को…"
रवि ने एक हाथ मेरी गांड पर मारा — "तू खुद चढ़ के ले रही है साली…"
मैंने कमर को गोल घुमाते हुए ऊपर नीचे झटके देने शुरू किए — अब मैं उसे चोद रही थी, जैसे उसकी सवारी कर रही हूँ। उसका लंड हर बार मेरी अंदरूनी सबसे नाजुक नसों को छूता, और मेरी कराहें बाथरूम की दीवारों से टकराकर लौटतीं।
“उँह्ह… उह्ह… हाँ… तू पूरा भर दे आज…”
मेरी चूत से सफेद झाग बाहर आने लगे — मैंने अपने स्तनों को पकड़ा, दोनों निपल्स मसलते हुए अपनी चोटी पर झटके देती रही।
और फिर — मैंने अपनी कमर को ऊपर खींचा, उसका लंड बाहर निकला — मोटा, लाल, रस से तर — और फिर से टब में झुक गई, घुटनों के बल, टब की दीवार पकड़ कर — “अब बना मुझे अपनी घोड़ी…”
मेरी गांड अब हवा में उठी हुई थी, और मेरी चूत पूरी तरह खुली — अंदर से चिपचिपी, गर्म, तड़पती हुई।
रवि ने बिना रुके अपना लंड पकड़कर उसे मेरे चूत पर सटाया, और एक ही झटके में — “धप्प!!”
“आह्ह्ह्ह्ह… उफ्फ्फ्फ्फ!!”
उसका लंड मेरी चूत में इतने ज़ोर से घुसा कि मैं आगे गिरते-गिरते बची — उसने मेरे बाल पकड़ लिए, और फिर कमर पर अपनी पकड़ मजबूत करके झटके देने लगा।
“धप… धप… धप… ह्ह्ह्ह… तू तो पूरी चूती है…”
“हाँ… हाँ… और गहरा… और तेज़… हाँ रवि… मार मुझे अपने लंड से…”
अब वो मुझे हर झटके पर अंदर तक भर रहा था — उसका लंड मेरी चूत में इतनी ज़ोर से जा रहा था कि पानी उछल-उछलकर मेरे पेट तक छपक रहा था।
मेरी आँखें पलट रही थीं — “रवि… मैं… निकल रही हूँ… हाँ… हाँ…”
उसने अपने लंड की रफ्तार और तेज़ की — मेरी चूत अब हर भराई पर चूस रही थी जैसे उसे उससे लंड खींच लेना हो।
“अब ले साली… ले मेरी ममता…”
और फिर — वो झटके से थमा। उसके लंड की नसें फड़कने लगीं —
“ध्र्र्र्र्र्र्र्श्श्श्श!!”
उसका गर्म वीर्य मेरी चूत में ऐसे फूटा जैसे नल खुल गया हो — अंदर की गर्मी और वो फीलिंग जैसे कोई लावा भर रहा हो।
मेरे होंठ खुल गए — "आह्ह्ह… तेरे वीर्य से भर गई मैं…"
मैं थकी, काँपती, पानी में आधी तैरती, आधी डूबी… और उसका लंड अब भी मेरे अंदर था — धड़कता हुआ।
मैंने मुस्करा कर कहा — "अब छोड़ूँगी नहीं तुझे…
कामिनी के नाम आपकी पाती
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