सुबह की धूप खिड़की से ऐसे घुस रही थी जैसे किसी ने सोने के धागों से हवा बुन दी हो। पिछली रात की दीवाली अब भी मेरी त्वचा पर जमी थी — दीपक के होंठों के निशान, उसकी उँगलियों के दबाव और वो गहरी थकान जो किसी औरत को तब महसूस होती है जब उसने खुद को पूरी तरह किसी मर्द को दे दिया हो।
मैंने हल्की पीली साड़ी पहन रखी थी, बिना ब्लाउज़ के, बस पल्लू से सीना ढका हुआ। रसोई में चाय का पानी चढ़ा रखा था, अदरक और इलायची की खुशबू हवा में फैल रही थी। पैरों में अब भी थोड़ी लड़खड़ाहट थी, जाँघों के बीच हल्की सी जलन — उस आठ इंच की रात की याद जो हर बार आँखें बंद करते ही फिर से धड़क उठती।
केतली में दूध डालते हुए मैंने हल्के हाथ से हिलाया, तभी पीछे से किसी की गर्म साँस मेरी गर्दन को छूती हुई ऊपर चढ़ गई। "सुप्रभात, मेरी रानी…" दीपक की भारी आवाज़ मेरे कान के पास थी।
मैं मुस्कुरा दी, "सुप्रभात, मेरे राजा।"
उसने मेरे कंधे पर किस किया — कई छोटे-छोटे चुंबन जो मेरी रीढ़ तक सिहरन भेजते रहे। "अब भी गर्म हो," उसने फुसफुसाया, "जैसे चाय नहीं, तुम ही उबल रही हो।"
मैंने पलटकर देखा — बस नीचा तौलिया बाँधे खड़ा था, गीले बाल और आँखों में वही भूख जो पिछली रात बुझी नहीं थी। "चाय बनने दो, फिर कुछ और सोचेंगे," मैंने कहा, मगर आवाज़ में इंकार नहीं था।
दीपक ने मेरे हाथ से चम्मच ले लिया और गैस बंद कर दी। "चाय बाद में भी पी सकते हैं," उसने मेरी कमर को अपनी ओर खींचा। अब मैं स्टोव और उसके बीच फँसी थी, उसके सीने की गर्मी मेरी पीठ से चिपक गई।
"दीपक… कोई आ जाएगा," मैंने कहा, मगर मेरे हाथ पहले ही पीछे जाकर उसकी कमर पकड़ चुके थे।
"आने दो," उसने मेरी साड़ी कमर से ऊपर खिसकाई, "पहले मैं आ जाऊँ।"
उसकी उँगलियाँ मेरे पेट पर घूमने लगीं, फिर नीचे उतर आईं। मैंने खुद को थोड़ा झुकाया, और जैसे ही उँगलियाँ मेरी जाँघों के बीच पहुँचीं, एक हल्की "म्म्म्म्ह्ह..." मेरे होंठों से निकली। "इतनी गीली सुबह-सुबह…" उसने कहा, "लगता है मेरा नाम अब भी अंदर लिखा है।"
मैंने पलटकर उसके गले में बाँहें डालीं और उसके होंठों को अपने होंठों में खींच लिया — "च्च्ह्ह्प्प्प्प..." — वो चुंबन लंबा था, गीला, रात की हर गर्मी से भरा।
अब वो पीछे से मुझे थामे हुए था और उसकी तौलिया नीचे सरक चुकी थी। उसका आठ इंच का लंड फिर से सख़्त हो चुका था, धड़कता हुआ, जैसे मेरे नाम से जागा हो।
"किचन में ही करेगा तू?" मैंने मुस्कराते हुए कहा। "जहाँ तू हो… वहीं मंदिर है।"
उसने मेरी साड़ी पूरी तरह ऊपर उठाई और मुझे हल्के से झुकाया, दोनों हाथ किचन काउंटर पर टिके हुए। मेरी चूत अब पूरी तरह खुली थी, भरी और भीगी। "तैयार हो, रानी?" "हमेशा…"
और फिर — "धप्प!" — एक ही झटके में उसने अपना लंड मेरे अंदर धंसा दिया। "आआह्ह्ह…!" मेरी आवाज़ चूल्हे की सीटी से भी ऊँची थी।
उसके हाथ मेरी कमर पर कस गए और उसने एक के बाद एक तेज़ धक्के मारने शुरू किए — "धप्प! धप्प! धप्प!" — हर बार मेरी देह काउंटर से टकराती, मेरे स्तन आगे झूलते, और मेरी चूत उसे और गहराई तक खींचती।
"ओह्ह्ह… कमिनी… कितनी टाइट है तू…" "हाँ… हाँ दीपक… वहीं… और अंदर…!"
अब उसने मेरी क्लिट को दो उँगलियों से दबाना शुरू किया, और मैं पूरी तरह काँपने लगी। उसके हर धक्के के साथ मेरी साँसें टूट रही थीं, मेरी जाँघें सख्त हो रही थीं।
"झड़ने वाली हूँ… आह्ह…!" "रोक मत खुद को… झड़ मेरे लंड पर…"
मैं अभी साँस भी नहीं ले पाई थी कि उसने धीरे से अपना लंड बाहर निकाला और मेरी गांड पर दो उँगलियाँ फेरने लगा। "अब पीछे से चाहिए न मेरी रानी?" उसने गरजते हुए कहा। मैंने सिर झुकाकर "हाँ..." कहा, आँखें बंद कर दीं।
उसने मेरी गांड के छेद पर अपना लंड लगाया, हल्का सा दबाव… और फिर "धप्प!" — पूरा अंदर धकेल दिया। "आआआह्ह्ह… स्स्स्स्स…!" मैंने चीखते हुए काउंटर को पकड़ लिया। मेरी गांड तनी, फिर ढीली पड़ी, और हर धक्के के साथ वो और गहराई तक जाता गया।
"अब तो तू पूरी मेरी है… चूत भी, गांड भी…" "हाँ… हाँ दीपक… सब तेरा है…!"
"धप्प! धप्प! धप्प!" हर धक्के के साथ मेरी आँखों के आगे रोशनी चमक रही थी। और फिर — "चटाक!" — उसकी हथेली मेरी गांड पर पड़ी।
"चटाक!" — "आआह्ह!" "चटाक!" — "उह्ह्ह्ह…" "चटाक!" — "हाँ… हाँ… मार और…" "चटाक!" — "दीपक… मेरा राजा…!"
चार थप्पड़ — हर बार मेरी चमड़ी जलती, और उसके बाद अगला धक्का और गहरा जाता। मेरे पैर काँप रहे थे, साँसें बेकाबू थीं।
"अब झड़ो मेरे साथ…" "आआआआह्ह्ह… आ रही हूँ…!"
मैंने अपनी गांड से उसका लंड भींच लिया, पूरा शरीर काँपने लगा, और फिर मैं फटी — गर्म, गीली, भींचती हुई। दीपक ने भी खुद को मेरे अंदर खाली कर दिया — गर्म वीर्य ने मेरी आँतों तक को गर्म कर दिया।
हम दोनों वहीं काउंटर से टिके खड़े रहे — पसीने से तर, चाय की खुशबू और सेक्स की गंध एक साथ घुली हुई। दीपक ने मेरी गर्दन पर किस किया, "अब बताओ, चाय में चीनी डालनी है या मैं ही काफी हूँ?"
मैंने पीछे पलटकर उसकी आँखों में देखा और मुस्करा दी, "अब हर सुबह चाय भी तू बनाएगा… और मैं भी।"
उसने मुझे अपनी बाहों में समेट लिया, और उस रसोई में जहाँ सिर्फ़ अदरक की खुशबू होनी चाहिए थी, वहाँ अब हमारी देहों की महक फैल चुकी थी — एक नई सुबह, एक नया रिश्ता, और एक आग… जो बुझने वाली नहीं थी।
कामिनी के नाम आपकी पाती
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