मैंने आज नीली साड़ी निकाली थी — वही जो कल्प को बहुत पसंद थी, लेकिन आज मैं किसी और की नज़रों में जलना चाहती थी।
साड़ी मेरे बदन से ऐसे चिपकी थी जैसे पानी में भीगी रेशमी चादर, और ब्लाउज़ इतना कस के था कि हर साँस के साथ मेरे स्तन उठते-गिरते रहे — जानबूझकर ऐसा किया था मैंने, क्योंकि मुझे पता था… दीपक आ रहा है।
तेरहवीं के बाद पहली दिवाली थी। घर में दीयों की कतार थी, मिठाइयों की खुशबू थी, लेकिन मेरी आँखों की चमक इन सबसे अलग थी — कई रातों से मैं खुद को आईने में देखती आ रही थी, और आज पहली बार मुझे लगा कि मैं फिर से औरत बन रही हूँ।
जब दीपक कमरे में आया, उसकी नज़र मुझ पर ठिठक गई — ठीक वैसी जैसे मैंने चाहा था। उसकी आँखें मेरे क्लीवेज से नीचे तक गईं और फिर वापस मेरे होठों पर आकर रुक गईं।
"दीपक…" मैंने थोड़ा मुस्कराते हुए कहा, "मिठाई लोगे, या कुछ और चाहिए?"
वो कुछ नहीं बोला — उसकी आँखें जवाब थीं। और मैं समझ गई, अब इंतज़ार नहीं करना।
मैंने उसका हाथ पकड़ा और उसे अपने कमरे की तरफ खींच लिया। कमरा आधा अंधेरे में था, बस एक दिया जल रहा था खिड़की के पास — उसकी लौ कांप रही थी, जैसे मेरे भीतर की आग से डर रही हो।
मैंने धीरे से दरवाज़ा बंद किया। वो अब मेरे ठीक सामने था। मैंने उसकी कमीज़ का बटन खोला, धीरे-धीरे, जैसे किसी रहस्य को खोल रही हूँ। उसकी छाती मेरी उंगलियों के नीचे गर्म और कड़ी थी। "तुम अब पूरे मर्द बन गए हो…" मैंने कान में फुसफुसाया, और मेरी आवाज़ खुद मुझे नई लगी — भूखी, गीली, भटकी हुई।
उसने मेरी साड़ी की प्लीट्स खींचीं — साड़ी कमर से नीचे सरक गई। मैंने खुद ब्लाउज़ के हुक खोल दिए — “च्र्र्राट” — और मेरे स्तन हवा में उभर आए, भारी, थरथराते हुए।
उसके होंठों ने मुझे छूआ — “च्प्प्प्प… ह्म्म्म...” — मेरे निप्पल चूसते हुए उसकी जीभ ने मुझे जगा दिया। मैंने उसके बालों में हाथ डाले और खुद को उसकी ओर खींच लिया — मैं चाहती थी कि वो मुझे चाटे, चोदे, तोड़े… और बना दे किसी चीज़ का हिस्सा, जो सिर्फ़ उसका हो।
"ये सब… सिर्फ़ तेरे लिए रखा है," मैंने उसके कान में कहा, जब उसने मेरी जाँघों को खोला और मेरी चूत को देखा — गीली, फिसलती, उसकी एक झलक भर से भीगती।
उसने खुद को निकाला — आठ इंच का लंड, मोटा, नसों से भरा — जैसे कोई गर्म साँप मेरी योनि को चीरने को तैयार हो। मैंने अपनी टाँगें और फैला दीं, चादर से पसीने की खुशबू उठ रही थी। “ले आ जाओ, दीपक…”
पहले उसने मेरे होंठों को चूमा, फिर मेरी गर्दन पर अपने दाँत से निशान छोड़ा। "तैयार हो?" "हर बार से ज़्यादा," मैंने कहा, और चारों हाथ-पैरों पर झुक गई।
“धप्प!” — पहली बार उसने अपनी हथेली से मेरी गांड पर मारा — मैं सिहर गई।
और फिर — "धप्प!" — एक झटका, आधा लंड मेरे अंदर घुस गया। “आआआह्ह… हाँ…!” मेरी चीख दीए की लौ से भी तेज़ थी।
वो अब मुझे पूरा भर रहा था — धीमे-धीमे नहीं, पूरे जोर से। “धप्प! धप्प! धप्प!” हर धक्का मुझे आगे सरकाता, मेरे स्तन झूलते, चूती सिकुड़ती और उसकी सख्त मर्दानगी से लड़ती।
उसकी उँगलियाँ मेरी क्लिट पर नाच रही थीं, और जब उसने उसमें उंगली डाली, मैं और भीग गई — पूरा बिस्तर मेरे रस से गीला हो गया।
"झड़ोगी?" उसने पूछा, और मेरी कमर थाम ली।
"हाँ... हाँ दीपक... अब...!" मेरे अंदर आग थी, और वो आग अब फूट रही थी।
"झड़ो फिर..." एक आखिरी धक्का — “धप्प!” — और मेरी चूत कस गई, धड़कने लगी, फटी तो नहीं, मगर बिखर गई।
"आआआआह्ह... हाँ हाँ हाँ...!" मैंने चिल्ला कर उसकी ओर मुड़ते हुए कहा, "ले सब... तेरा हूँ मैं..."
उसने गहराई तक घुसकर खुद को मेरे अंदर खाली कर दिया — उसकी गर्मी मेरी कोख तक गई, हर स्पंदन ने मुझे पूरा भर दिया।
हम वहीं लेटे थे — पसीने से तर, वीर्य से सने हुए, और दीये की मद्धम रौशनी में जैसे हम किसी और ही दुनिया के थे।
मैंने उसकी आँखों में देखा, मुस्कराई और कहा, "क्या अब ये रिश्ता सिर्फ़ रातों का रहेगा?"
दीपक चुप था — फिर उठकर कमरे में रखे कपड़े के ढेर से लाल रेशमी चादर निकाली, फर्श पर रखी, उसके बीच एक छोटा दिया जलाया।
"ये रहे हमारे सात वचन," उसने कहा, "आज से तू सिर्फ़ मेरी है — पत्नी बनके, साथी बनके।"
मैंने बिना कुछ कहे उसके हाथ थामे — हम दोनों ने उस छोटी सी अग्नि के सामने एक-दूसरे की आँखों में देख कर कसमें खाईं।
बिना पंडित, बिना मंडप, बिना गवाहों के — बस एक दिया, दो बदन, और एक रिश्ता — जो अब जन्मों का हो गया।
कामिनी के नाम आपकी पाती
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