ऐसे ही एक बार बस में मेरी मुलाकात विकास से हुई। बस की भीड़ का फायदा उठाकर उसने मेरे बदन पर हाथ फेरना शुरू कर दिया। उसकी उंगलियाँ मेरे शरीर पर रेंगती रहीं और धीरे-धीरे वह मुझे पटाने में भी सफल हो गया। मैं तो पहले से ही बड़े और मोटे लंड की दीवानी थी। उसका इशारा पाते ही मेरी मुस्कान छिप नहीं पाई। बस से उतरते ही वह मेरे पीछे-पीछे चल दिया। थोड़ा आगे जाकर उसने कॉफी के लिए कहा। उसके हाथों ने मुझे बस में ही इतना गर्म कर दिया था कि मैं तुरंत हाँ में हाँ मिला दी।
वह मुझे एक रेस्टोरेंट ले गया। कॉफी पीते-पीते उसके हाथ मेरी जांघ पर फिसलते रहे, फिर सीधे मेरी चूत पर आ गए। चुदासी होने की वजह से मेरी टाँगें खुद-ब-खुद चौड़ी होती चली गईं। विकास ने मेरी प्यास भाँप ली और बोला, “आज मेरे घर में कोई नहीं है… क्या मेरे साथ चलोगी?”
ऐसे मौके को मैं कैसे छोड़ सकती थी? मैं तुरंत तैयार हो गई। उसने मुझे पार्किंग में ले जाकर अपनी बाइक निकाली और जालंधर के एक मुहल्ले में पहुँचा दिया।
उसकी शानदार कोठी थी। ताला खोलते ही उसने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया। मैं भी बिना वक्त गँवाए अपनी चूत की प्यास बुझवाना चाहती थी। विकास ने मुझे उठाया और बेडरूम में ले जाकर एक-एक करके मेरे कपड़े उतारने लगा। मैंने भी उसका साथ दिया और कुछ ही पलों में पूरी नंगी हो गई। फिर वह भी नंगा हो गया।
हम दोनों एक-दूसरे से लिपट कर बेड पर लुढ़कने लगे। विकास का तना हुआ मोटा लंड मेरी भीगती चूत में घुसने को बेकरार था। मैंने खुद उसका लंड पकड़कर अपनी चूत में डाल लिया। उसने जोर-जोर से पेलना शुरू किया। मेरी चूत उसके मोटे लंड से चुदने लगी।
मेरे मुँह से “उम्म्ह… अहह… हाय… याह… आह्ह…” की आवाजें निकलने लगीं। मैं बिना किसी डर के जोर-जोर से चिल्लाने लगी। उसका लंड और उसकी जवानी का जोश मेरी आग बुझाने के लिए काफी था।
बीस मिनट की चुदाई के बाद विकास मेरी चूत में ही झड़ गया। मैं भी झड़ चुकी थी। उसकी गाढ़ी वीर्य मेरी चूत से बाहर निकल रही थी, लेकिन मेरी प्यास अभी बाकी थी। मैं दूसरे राउंड का इंतजार करने लगी। विकास का मन भी भरा नहीं था। उसने मुझे घोड़ी बनने को कहा।
मुझे अलग-अलग तरीकों से चुदवाना बहुत पसंद है। मैंने झट से अपनी 42 इंच चौड़ी गाँड ऊपर उठा दी, सिर तकिये पर रखा और कमर नीचे झुका ली। मेरे बड़े-बड़े चूतड़ दोनों तरफ फैल गए। विकास ने मेरी गाँड सहलाई और फिर अपनी लोहे जैसी सख्त लंड मेरी खुली चूत में घुसेड़ दी।
मोटा लंड अन्दर जाते ही मेरे मुँह से सिसकारियाँ निकलने लगीं। मैं आहें भरती हुई उसकी चुदाई का मजा ले रही थी…
तभी मेरी नज़र खिड़की पर पड़ी और हमें बीच में ही रुकना पड़ा।
दरवाजे पर जोर-जोर से लातें पड़ने लगीं। दादा जी चिल्ला रहे थे— “अरे नालायक! दरवाजा खोल… वरना तेरी टाँगें तोड़ दूँगा!”
विकास बुरी तरह काँप रहा था। वह जल्दी-जल्दी कपड़े ढूँढने लगा, लेकिन दादा जी लगातार लातें मार रहे थे। विकास सिर्फ अंडरवियर पहन पाया और दरवाजा खोलना पड़ा।
मैं मुश्किल से अपनी पैंटी पहन पाई थी। बाकी बदन चादर से ढक लिया और बेड के कोने में बैठ गई।
दादा जी गुस्से से अन्दर घुसे और विकास पर चिल्लाने लगे— “नालायक! शर्म नहीं आई? उम्र पढ़ने-लिखने की है और तू ये सब कर रहा है?”
फिर उन्होंने मेरी तरफ देखा और गुस्से से बोले— “तू बता… तू कौन है? हिम्मत कैसे हुई हमारे बच्चे के साथ ये सब करने की?”
उन्होंने मेरी बाजू पकड़कर खड़ी कर दी। मैं चादर संभालते हुए सॉरी बोलने लगी, लेकिन दादा जी ने चादर खींचकर नीचे गिरा दी और मुझे धकेलते हुए कहा— “चल, ऐसे ही घर जा… कपड़े नहीं मिलेंगे!”
मैं हाथ जोड़कर अपने चुचों को छिपाने की कोशिश करती हुई बोली— “दादा जी, प्लीज़ मेरे कपड़े दे दीजिए… आगे से विकास से कभी नहीं मिलूँगी।”
विकास भी हाथ जोड़कर माफी माँगने लगा, लेकिन दादा जी ने उसे बाहर मेन गेट बंद करने भेज दिया।
जैसे ही विकास गया, दादा जी ने मुझे बाँहों से पकड़कर बेड पर गिरा दिया और बोले— “अब तुझे माफ करता हूँ…”
इसके साथ ही वे मेरे ऊपर लेट गए। उन्होंने मेरे होंठों को अपने मुँह में ले लिया और चूसने लगे। उनकी धोती के अंदर का सख्त लंड मेरी चूत पर दबाव डाल रहा था। मैं समझ गई थी कि वे चुदाई करके ही माफ करेंगे। जितना उन्होंने पहले डराया था, उतना ही अब मुझे डर लग रहा था कि मना किया तो नंगी हालत में बाहर निकाल देंगे। इसलिए मैं चुपचाप उनका साथ देने लगी।
दादा जी ने धोती उतार दी। मैंने उनका कुर्ता ऊपर खींच दिया। उनकी सफेद-काली बालों वाली छाती मेरे मुलायम गोरे चुचों पर रगड़ने लगी। मैं भी चुचे उछाल-उछाल कर उनके सीने से सटा रही थी। उन्होंने मेरे चुचों को जोर-जोर से दबाया और पैंटी के ऊपर से ही अपना लंड रगड़ने लगे। उनका लंड एकदम टाइट और असली मर्द जैसा महसूस हो रहा था।
तभी विकास लौटा। दादा जी को मेरे ऊपर चढ़ा देखकर वह भौंचक्का रह गया। दादा जी ने कहा— “दरवाजा बंद कर दिया? अब दूसरे कमरे में बैठ… बाद में बुलाऊँगा।”
विकास चुपचाप बाहर चला गया। मैंने उसे जाते हुए एक हल्की मुस्कान दे दी।
दादा जी उठे, मेरी टाँगों के बीच बैठे और मेरी पैंटी खींचकर उतार दी। अपना कच्छा भी उतार दिया। फिर उन्होंने मुझे अपनी जाँघों पर बिठा लिया। मेरी चूत उनके सख्त लंड से टकरा गई। उन्होंने मेरी कमर पकड़कर मुझे अपने से सटा लिया और दोनों चुचों को बारी-बारी चूसने लगे।
मैं उनकी पीठ पर नाखून गड़ा रही थी। मेरी चूत से पानी की बौछार हो रही थी, जिससे उनका लंड भीग चुका था। वे मुझे तड़पा रहे थे। मैंने खुद चूतड़ों को ऊपर उठाया, अपनी चूत उनके लंड पर सेट की और धीरे-धीरे बैठने लगी।
दादा जी के मुँह से “आआह्ह्ह…” निकला। उन्होंने कमर अकड़ाई और पूरा लंड एक झटके में मेरी चूत में धकेल दिया।
“अरे वाह मेरी कामिनी… एक ही बार में पूरा निगल लिया!”
मैंने उनकी आँखों में देखते हुए कहा— “आप इतना तड़पा रहे थे… इसलिए आपकी कामिनी ने एक साथ ही निगल लिया।”
दादा जी मुस्कराए— “सच में कामिनी… इतनी तड़प थी तुझमें… वरना कब का डाल दिया होता।”
“अभी तो बहुत तड़प बाकी है दादा जी… वो भी आपसे ही पूरी करवानी है।”
“अच्छा… तो ले कामिनी… जितनी मर्जी पूरी कर!”
उन्होंने मेरी कमर कसकर पकड़ी और नीचे से जोर का धक्का मारा। मेरे मुँह से “आह्ह्ह्ह…” निकल गई। मैं उनकी गोद में बैठकर चूतड़ हिला-हिलाकर उनका लंड अन्दर-बाहर करने लगी। वे मेरे बदन को मसल रहे थे, चेहरा मेरे चुचों पर रगड़ रहे थे।
मैंने आँखें बंद कर लीं, बाँहें ऊपर उठाईं और पीछे झुक गई। मेरी चूत का दबाव और बढ़ गया। मैं पूरी तरह मदहोश होकर उनके लंड को झटकों के साथ अपनी चूत में ले रही थी। मेरी मादक सिसकारियाँ कमरे में गूँज रही थीं।
कुछ देर बाद दादा जी ने मुझे पीछे लिटा दिया और खुद ऊपर आ गए। उन्होंने मेरी दोनों टाँगें ऊपर उठाईं और पूरा वजन डालकर पेलने लगे। उनका लंड मेरी चूत की जड़ तक पहुँच रहा था।
वे जोर-जोर से धक्के मारते हुए बोल रहे थे— “आह… ले कामिनी… खूब चिल्ला… जितना चिल्लाएगी उतना ही जोर से चोदूँगा!”
उनकी बात सुनकर मैं और जोर से चिल्लाने लगी। सच में, ज्यादा चिल्लाने से चुदाई का मजा दोगुना हो जाता है। यह मेरा पहला अनुभव था।
दादा जी ने करीब बीस मिनट तक जोरदार चुदाई की और फिर मेरी चूत में ही अपना गाढ़ा लावा छोड़ दिया। मैं पहले ही झड़ चुकी थी। उनका वीर्य उनके तेज झटकों से बाहर निकल रहा था। वे मुझे इतने कसकर पकड़े हुए थे कि हिलना भी मुश्किल था।
आखिरकार जब उनका पूरा माल निकल गया, वे ढीले पड़ गए। लंड धीरे-धीरे मेरी चूत से बाहर फिसल गया। दोनों थककर लेट गए।
पाँच मिनट भी नहीं बीते होंगे कि विकास कमरे में आया और हिचकिचाते हुए बोला— “दादा जी… अब आप दूसरे कमरे में चले जाइए…”
दादा जी ने कहा— “मैं कहीं नहीं जाऊँगा। तूने जो करना है मेरे सामने कर!”
विकास कुछ नहीं बोला। उसने पैंट-अंडरवियर उतारे और मेरे पास आकर लेट गया। मैं पहले से नंगी पड़ी थी। उसने मुझे फिर से घोड़ी बना लिया, पीछे से अपनी सख्त लंड मेरी चूत में डाल दी और जोर-जोर से पेलने लगा। मैं फिर से चिल्ला-चिल्लाकर चुदने लगी।
तभी दादा जी मेरे मुँह के सामने आ बैठे। उनका लंड फिर से खड़ा हो चुका था। उन्होंने मेरे सिर को पकड़कर अपना लंड मेरे मुँह में ठूंस दिया। मैंने मुँह खोला और उन्हें चूसने लगी।
दोनों एक साथ मेरी चुदाई कर रहे थे… और मैं पूरी तरह से उनके बीच फँसी हुई थी।
विकास मेरे पीछे घोड़ी की पोजीशन में बैठा था। उसकी दोनों हथेलियाँ मेरे मोटे चूतड़ों को जोर से दबाए हुए थीं। उसने अपना मोटा, सख्त लंड एक झटके में मेरी भीगी हुई चूत में पूरा घुसेड़ दिया था। हर धक्के के साथ मेरी चूत की दीवारें उसके लंड को कसकर जकड़ लेती थीं। उसकी गाँड से टकराती हुई मेरी बड़ी-बड़ी गांड की थपथपाहट कमरे में गूँज रही थी।
“आह्ह्ह… हाय… विकास… और जोर से… पूरी चूत फाड़ दे…” मैं चीख रही थी।
सामने दादा जी घुटनों के बल बैठे थे। उनका सफेद बालों वाला लंड फिर से लोहे की रॉड जैसा तन चुका था। उन्होंने मेरे बालों को मुट्ठी में जकड़ लिया और अपना लंड मेरे खुले मुँह में ठूंस दिया। मैंने होंठों से उनके लंड को कसकर चूसा। उनकी गरम, नमी वाली लंड मेरे गले तक पहुँच रही थी। हर बार जब वे आगे धकेलते, मेरी आँखों से पानी निकल आता, लेकिन मैं और गहराई तक ले जाती।
विकास पीछे से जोर-जोर के धक्के मार रहा था। उसका लंड मेरी चूत की जड़ तक पहुँचकर रगड़ खा रहा था। मेरी चूत से पानी की धारें निकल रही थीं जो उसकी जाँघों पर बह रही थीं। हर धक्के के साथ मेरा पूरा बदन आगे की तरफ धकेल दिया जाता और दादा जी का लंड और गहरा मेरे मुँह में घुस जाता।
दादा जी हँसते हुए बोले— “ले कामिनी… दोनों तरफ से ले… मुँह भी चोद और चूत भी… तू तो बनी हुई है दोनों को एक साथ निगलने के लिए।”
मैं सिर्फ गुर्राहट भरी आवाजें निकाल पा रही थी क्योंकि उनका लंड मेरे मुँह में भरा हुआ था। “म्म्म्ह… उम्म्ह… ग्लक्क… ग्लक्क…”
विकास ने मेरी कमर और जोर से पकड़ी और अपनी रफ्तार बढ़ा दी। उसके मोटे लंड की घर्षण से मेरी चूत में जलन और मजा दोनों एक साथ हो रहे थे। “दादा जी… देखो कितनी गरम चूत है इसकी… पानी की नदी बह रही है!”
दादा जी ने मेरे सिर को और कसकर पकड़ा और अपने लंड को मेरे गले में धकेलने लगे। मैंने दोनों हाथ उनके जाँघों पर रख दिए और खुद उनके लंड को चूसने लगी। जीभ से उनके मुंडे को चाटती, फिर पूरा लंड अन्दर लेती। उनकी गोलियों को भी हाथ से सहला रही थी।
कुछ देर बाद विकास ने मेरी चूत से लंड निकाला। उसकी लंड चमक रही थी मेरी चूत के पानी से। उसने मुझे पलट दिया। अब मैं पीठ के बल लेटी हुई थी। विकास ने मेरी दोनों टाँगें फैला दीं और फिर से अपना लंड मेरी चूत में पेल दिया। इस बार आमने-सामने।
दादा जी मेरे सिर की तरफ आ गए। उन्होंने मेरे ऊपर घुटने टिकाए और अपना लंड फिर से मेरे मुँह में डाल दिया। अब विकास नीचे से मेरी चूत चोद रहा था और दादा जी ऊपर से मेरे मुँह को।
हर धक्के के साथ मेरी चूत विकास के लंड से भरी जा रही थी। मेरी बड़ी चुचियाँ ऊपर-नीचे उछल रही थीं। दादा जी एक हाथ से मेरी एक चुची को जोर से मसल रहे थे, निप्पल को उंगलियों में दबा-दबाकर खेल रहे थे।
“आह्ह्ह… दादा जी… विकास… दोनों… दोनों एक साथ… मुझे पागल कर रहे हो…” मैं बीच-बीच में चीख पा रही थी जब दादा जी का लंड थोड़ा बाहर निकलता।
विकास ने मेरी टाँगें अपने कंधों पर रख लीं और पूरा वजन डालकर पेलने लगा। उसका लंड इतनी गहराई तक जा रहा था कि मुझे लगता मेरी चूत फट जाएगी। दादा जी ने भी अपनी रफ्तार बढ़ा दी। वे मेरे मुँह को बिल्कुल अपनी गाँड तक दबाए हुए चोद रहे थे।
फिर विकास अचानक रुका। उसने अपना लंड निकाला और दादा जी से कहा— “दादा जी… आप भी इसकी चूत चोदो… मैं मुँह लेता हूँ।”
दादा जी मुस्कराए। उन्होंने मेरी टाँगें फैलाईं और अपना मोटा, अनुभवी लंड मेरी चूत के मुँह पर लगा दिया। एक जोरदार धक्के में पूरा लंड अन्दर घुस गया।
“आआह्ह्ह्ह… दादा जी…!” मेरी चीख निकल गई।
उनका लंड विकास से थोड़ा मोटा और लंबा महसूस हो रहा था। वे धीरे-धीरे शुरू करके फिर जोरदार धक्के मारने लगे। हर धक्के के साथ उनकी सफेद बालों वाली छाती मेरे चुचों से रगड़ खा रही थी।
विकास मेरे मुँह के पास आ गया। उसने अपना चूत के पानी से भीगा हुआ लंड मेरे होंठों पर रख दिया। मैंने तुरंत मुँह खोलकर उसे चूसना शुरू कर दिया। अपनी ही चूत का स्वाद मेरे मुँह में आ रहा था।
अब दादा जी मेरी चूत चोद रहे थे और विकास मेरा मुँह। दोनों की रफ्तार एक जैसी हो गई थी। जब दादा जी आगे धकेलते, विकास भी आगे धकेलता। मेरा पूरा शरीर दोनों के बीच झूल रहा था।
दादा जी जोर से बोल रहे थे— “ले कामिनी… ले मेरा पूरा लंड… तेरी चूत तो जैसे मेरे लिए बनी हुई है… कितनी कसकर जकड़ रही है…”
मैं सिर्फ सिसकारियाँ और गुर्राहट निकाल पा रही थी। मेरी आँखें बंद थीं, बदन पसीने से तरबतर। चुचियाँ इतनी संवेदनशील हो गई थीं कि हल्का सा छूने पर भी झटके लग रहे थे।
फिर दोनों ने पोजीशन बदली। विकास ने मुझे अपनी गोद में बिठा लिया। मैं उनकी जाँघों पर बैठकर उनका लंड अपनी चूत में लिए हुए ऊपर-नीचे हो रही थी। दादा जी पीछे से आ गए। उन्होंने मेरी गांड के छेद पर थूक लगाई और धीरे-धीरे अपनी उंगली अन्दर डाली। फिर उंगली निकालकर अपना लंड मेरे गांड के छेद पर लगा दिया।
“दादा जी… धीरे…” मैं कराह उठी।
लेकिन दादा जी ने धीरे-धीरे अपना लंड मेरे गांड में घुसेड़ना शुरू कर दिया। पहले सिर्फ मुंडे तक, फिर आधा, फिर पूरा। मेरी गांड फैल गई उनके मोटे लंड से। अब मेरी चूत में विकास का लंड था और गांड में दादा जी का।
दोनों एक साथ पेलने लगे। डबल पेनिट्रेशन। मेरी चूत और गांड दोनों भरी हुई थीं। इतनी भरी हुई कि मुझे सांस लेने में तकलीफ हो रही थी। दोनों के लंड अन्दर एक-दूसरे से रगड़ खा रहे थे, सिर्फ एक पतली दीवार के पार।
“आह्ह्ह… हाय राम… दोनों… दोनों एक साथ… मुझे मार डालोगे…” मैं जोर-जोर से चिल्ला रही थी।
विकास नीचे से ऊपर धकेल रहा था, दादा जी पीछे से। दोनों की लय मिल गई थी। मेरी गांड और चूत की थपथपाहट, उनकी भारी साँसें, मेरे चीखने की आवाजें… पूरा कमरा इन आवाजों से भर गया था।
मैं कई बार झड़ चुकी थी। मेरी चूत बार-बार ऐंठ रही थी, गांड भी सिकुड़-सिकुड़ कर उनके लंड को जकड़ रही थी। विकास पहले झड़ा। उसने मेरी चूत के अन्दर ही अपना गाढ़ा वीर्य छोड़ दिया। गर्म लावा महसूस होते ही मेरी चूत और जोर से ऐंठ गई।
दादा जी अभी भी मेरी गांड चोद रहे थे। उन्होंने विकास के निकलने के बाद मुझे घोड़ी बना लिया और दोनों हाथों से मेरी गांड के गालों को फैलाकर और जोर से पेलने लगे। कुछ देर बाद वे भी जोर की गर्जना के साथ मेरी गांड में ही झड़ गए। उनका गर्म वीर्य मेरी गांड के अन्दर भर गया।
लेकिन दोनों थके नहीं थे। थोड़ी देर आराम करने के बाद विकास का लंड फिर तन गया। दादा जी का भी। फिर से दोनों ने मुझे बीच में लिया। कभी विकास चूत में और दादा जी मुँह में, कभी उल्टा, कभी दोनों ने बारी-बारी से मेरी चूत को चोदा, कभी एक ने गांड और दूसरे ने चूत।
चार घंटे तक लगातार। मेरी चूत और गांड दोनों लाल और सूजी हुई थीं। वीर्य की धारें मेरी टाँगों से बह रही थीं। लेकिन मैं अभी भी चिल्ला-चिल्लाकर और माँग रही थी।
“और… और चोदो… दोनों… मुझे और चोदो…”
और दादा-पोता दोनों मिलकर मेरी हर इच्छा पूरी करते रहे।