अगले दिन सुबह से ही मेरा मन बेचैन था। जसवन्त का वादा बार-बार याद आ रहा था—“कल घर आकर घंटों घपाघप करूँगा।”
दोपहर करीब दो बजे दरवाज़े पर दस्तक हुई। मैंने दरवाज़ा खोला तो जसवन्त खड़ा था। एक हाथ में मेरा नया ब्लाउज़ और लहंगा था, दूसरे हाथ में एक छोटा सा बैग। वह साफ़-सुथरे कपड़ों में था, बाल कंघी किए हुए, और आँखों में वही हवस भरी चमक।
“नमस्ते मैडम,” उसने मुस्कुराते हुए कहा। “आपका ब्लाउज़ रेडी है। घर पर ही दे दिया।”
मैंने उसे अंदर बुला लिया और दरवाज़ा बंद कर दिया। कमरे में कोई नहीं था।
जसवन्त ने पैकेट मेज़ पर रखा, फिर सीधे मेरे पास आकर मेरी कमर पकड़ ली।
“कल का वादा याद है ना?” उसने मेरे कान में फुसफुसाया। “आज घर में आराम से, बिना किसी डर के… पूरा मज़ा लेंगे।”
मैंने सिर्फ़ सिर हिलाया। मेरा दिल तेज़ी से धड़क रहा था।
उसने मुझे बेडरूम में खींच लिया। दरवाज़ा बंद होते ही उसने मुझे दीवार से सटा दिया और गहरे चुंबन करने लगा।
उसकी जीभ मेरे मुँह में घुस गई, हाथ मेरे स्तनों पर। ब्लाउज़ के ऊपर से ही वह उन्हें मसलने लगा।
“उतारो सब… आज नंगी ही रहना है तुम्हें,” उसने हुक्म दिया।
मैंने साड़ी खोल दी। जसवन्त ने खुद मेरे ब्लाउज़ के हुक खोले, ब्रा उतारी और पेटीकोट समेत पैंटी एक झटके में नीचे खींच दी। मैं पूरी तरह नंगी उसके सामने खड़ी थी। उसने मुझे बिस्तर पर धकेल दिया।
वह खुद भी कपड़े उतारने लगा। कमीज़, पजामा… सब फर्श पर गिर गए। उसका लंड पहले से ही तना हुआ था, नसों से भरा, सिर चमकता हुआ। कल से भी ज़्यादा कड़ा लग रहा था।
जसवन्त बिस्तर पर चढ़ आया। पहले उसने मेरे स्तन चूसे, दाँतों से निपल्स काटे, फिर जीभ से मेरी गर्दन, पेट और जाँघों को चाटा। जब उसकी जीभ मेरी चूत पर पहुँची तो मैं कराह उठी।
“आह्ह… जसवन्त भाई… कल से भी गहराई से चाटो…”
उसने दोनों टाँगें फैला दीं और जीभ अंदर तक घुसा दी। चूसता, चाटता, क्लिटोरिस को घुमाता रहा। मेरे योनि से पानी बहने लगा। मैंने उसके बाल पकड़कर सर को और दबा दिया। लगभग दस-बारह मिनट बाद जब मैं चरम के करीब पहुँची तो उसने मुँह हटा लिया।
“अब मेरा नंबर,” उसने कहा और मेरे ऊपर आ गया।
लंड का मोटा सिर मेरी गीली चूत पर रखा और एक जोरदार धक्के में पूरा अंदर घुसा दिया।
“उफ़्फ़्फ़… कितनी टाइट और गरम है अभी भी!” वह कराह उठा।
फिर शुरू हो गई असली घपाघप।
जसवन्त ने मेरे दोनों पैर अपने कंधों पर रख लिए और जोर-जोर से ठोकरें मारने लगा। हर धक्के के साथ बिस्तर चरमरा रहा था। मेरे स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे, मैं कराह रही थी।
“और जोर से… हाँ… मेरी चूत फाड़ दो…” मैं चिल्ला रही थी।
वह कभी धीरे, कभी बहुत तेज़। कभी झुककर मेरे होठ चूसता, कभी मेरे स्तन मसलता। पसीना दोनों के शरीर से बह रहा था। कमरे में सिर्फ़ मांस की थप-थप, गीली चूत की चप-चप और हमारी कराहें गूँज रही थीं।
थोड़ी देर बाद उसने मुझे पलट दिया। मैं चारों पर हो गई। उसने पीछे से घुसकर और भी गहराई तक चोदना शुरू कर दिया। एक हाथ से मेरे बाल पकड़े, दूसरे से मेरे स्तन मसले।
वह हँसते हुए बोल रहा था। “आज पूरा वीर्य अंदर भर दूँगा।”
मैं पागल हो रही थी। उसने फिर मुद्रा बदली—मुझे उसके ऊपर बैठा दिया। मैंने खुद उसके लंड पर बैठकर कमर हिलानी शुरू कर दी। ऊपर-नीचे, आगे-पीछे। मेरे स्तन उसके चेहरे के सामने झूल रहे थे, वह उन्हें चूस रहा था।
“मैडम… तुम्हारी चूत मेरा लंड निचोड़ रही है…” वह हाँफ रहा था।
मैं नंगी बिस्तर पर लेटी हुई थी। जसवन्त ने मेरे दोनों पैर फैलाए और अपने कंधों पर रख लिए। उसका मोटा, तना हुआ लंड मेरी भीगी हुई चूत के मुँह पर टिका।
उसने धीरे-धीरे धकेला। पहले सिर्फ़ सिर अंदर गया, फिर एक लंबी, गहरी ठोकर में पूरा लंड मेरे अंदर समा गया।
“आह्ह्ह… जसवन्त…” मेरी आँखें बंद हो गईं।
वह मेरे ऊपर आ गया। उसका भारी बदन मेरे स्तनों को दबा रहा था। उसने मेरे दोनों हाथ पकड़कर सिर के ऊपर दबा दिए और जोर-जोर से धक्के मारने लगा। हर ठोकर के साथ उसका लंड मेरी दीवारों को फाड़ता हुआ गर्भ तक पहुँच रहा था। मेरे स्तन उसके सीने से रगड़ खा रहे थे, निपल्स कठोर हो गए थे।
वह कभी धीरे-धीरे पूरा बाहर खींचता, फिर एक झटके में अंदर धकेल देता। कभी तेज़-तेज़ छोटे धक्के मारता। बिस्तर चरमरा रहा था। मेरी कराहें कमरे में गूँज रही थीं।
“और गहरा… हाँ… ऐसे ही चोदो…” मैं उसके कान में फुसफुसा रही थी।
उसने मेरा एक पैर और ऊपर उठाया, जिससे लंड और भी अंदर तक चला गया। मेरी चूत की दीवारें उसके मोटे लंड को जकड़े हुए थीं। हर धक्के के साथ उसके अंडकोष मेरी गांड से थप-थप टकरा रहे थे। पसीना दोनों के शरीर से बह रहा था। करीब पंद्रह मिनट तक वह मुझे इसी पोज़ीशन में चोदता रहा, फिर अचानक रुका।
उसने मुझे पलट दिया। मैं चारों हाथ-पैरों पर हो गई। मेरे नितंब ऊपर उठे हुए थे, चूत पूरी तरह खुली और चमक रही थी। जसवन्त ने पीछे से आकर दोनों हाथों से मेरे नितंबों को फैलाया और अपना लंड एक झटके में अंदर घुसा दिया।
“उफ़्फ़्फ़… पीछे से और टाइट लग रही है!” वह कराह उठा।
अब धक्के और भी जोरदार हो गए। वह एक हाथ से मेरे बाल पकड़कर खींच रहा था, जिससे मेरा सर पीछे झुक गया। दूसरे हाथ से वह मेरे स्तन मसल रहा था। हर ठोकर के साथ मेरी गांड उसकी जाँघों से जोर से टकरा रही थी—थप… थप… थप…
मेरी चूत से पानी की आवाज़ आ रही थी—चप-चप-चप। वह कभी पूरा बाहर निकालता, फिर जोर से अंदर पेल देता। कभी धीरे-धीरे घुमाता। मेरी कमर अपने-आप हिलने लगी थी। “और जोर से जसवन्त भाई… मेरी चूत फाड़ दो… हाँ… ऐसे…” मैं चीख रही थी।
उसने मेरी कमर पकड़कर और तेज़ कर दी। मेरे स्तन हवा में झूल रहे थे। वह झुककर मेरे कान में गंदी बातें कर रहा था—“आशुतोष की बीवी को उसका दोस्त पीछे से चोद रहा है… कैसा लग रहा है?”
मैं सिर्फ़ कराह पा रही थी। इस पोज़ीशन में वह लगभग बीस मिनट तक लगातार पेलता रहा। मेरी जाँघें काँपने लगी थीं।
अचानक उसने मुझे फिर घुमाया और खुद बिस्तर पर चित लेट गया। उसका लंड सीधा खड़ा था, नसों से भरा, चमकता हुआ।
“अब तुम बैठो मैडम… खुद चोदो,” उसने कहा।
मैंने उसके ऊपर घुटनों के बल बैठकर अपना योनि द्वार उसके लंड के सिर पर रखा और धीरे-धीरे नीचे बैठ गई। पूरा लंड मेरे अंदर समाते ही दोनों कराह उठे।
अब नियंत्रण मेरे हाथ में था। मैंने कमर हिलानी शुरू की—पहले धीरे-धीरे ऊपर-नीचे, फिर तेज़। मेरे स्तन उसके चेहरे के सामने झूल रहे थे। उसने दोनों हाथों से उन्हें पकड़कर मुँह में ले लिया, निपल्स चूसने और काटने लगा।
मैं कभी आगे-पीछे हिलती, कभी घुमावदार हरकतें करती। उसका लंड मेरी चूत की दीवारों को रगड़ रहा था। मैंने हाथ पीछे करके उसके अंडकोष सहलाए।
“मैडम… तुम्हारी चूत मेरा लंड निचोड़ रही है… और तेज़ बैठो…” वह हाँफ रहा था।
मैंने रफ़्तार बढ़ा दी। ऊपर उठती और जोर से नीचे बैठ जाती। हर बार लंड गर्भ तक पहुँच जाता। मेरे बाल बिखरे हुए थे, पसीना चेहरे पर बह रहा था। जसवन्त नीचे से भी धक्के मारने लगा। हम दोनों मिलकर पागलों की तरह हिल रहे थे।
करीब पंद्रह-बीस मिनट तक मैं उसके ऊपर नाचती रही। मेरी चूत से पानी उसकी जाँघों पर बह रहा था। जब मैं थकने लगी तो उसने मुझे पकड़कर फिर मिशनरी में लिटा दिया और आखिरी जोरदार धक्कों के साथ अपना पूरा वीर्य मेरे अंदर उड़ेल दिया।
तीनों पोज़ीशनों में उसने मुझे बारी-बारी से घंटे भर से ज़्यादा चोदा। हर पोज़ीशन का मज़ा अलग था… और हर बार मेरी चूत और भी गीली व संवेदनशील होती गई।
आखिर में वह फिर से मुझे लिटाकर जोर-जोर से धक्के मारने लगा। उसकी साँसें तेज़ हो गईं।
“अब निकालूँगा… अंदर?”
“हाँ… पूरा अंदर डाल दो जसवन्त भाई…”
आखिरी कुछ तेज़ ठोकरों के साथ उसका शरीर अकड़ गया। गर्म, गाढ़ा वीर्य झटकों के साथ मेरे गर्भ में फूट पड़ा। इतना ज़्यादा कि बाहर भी निकलने लगा। वह कुछ देर अंदर ही पड़ा रहा, हाँफता हुआ, फिर धीरे-धीरे निकाला।
दोनों पसीने से लथ-पथ बिस्तर पर लेटे थे। जसवन्त ने मुझे अपनी बाहों में खींच लिया और मेरे माथे पर चुंबन लिया।
मैंने मुस्कुराते हुए उसके सीने पर सिर रख दिया। उसके वीर्य की गर्माहट अभी भी मेरे अंदर महसूस हो रही थी।
कुछ देर बाद उसने कपड़े पहने, मुझे एक लंबा चुंबन दिया और चला गया।
मैं नंगी बिस्तर पर पड़ी रही… शरीर में सुन्नता और संतुष्टि दोनों एक साथ।