ब्लाउज़ सिलाने गई, चुदवा कर आ गई
CHAPTER 22 Forbidden Desires

ब्लाउज़ सिलाने गई, चुदवा कर आ गई

Laid on the counter, every fold visible in the mirrors… and Jaswant fucked me hard.
"नाप तो कमर की लेनी थी, लेकिन चूत की गहराई नाप ली।"
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अगले दिन छुट्टी थी, इसलिए मैं कपड़े लेकर जसवन्त की दुकान पहुँची।

उसने मुझे देखते ही नमस्ते किया और अंदर बिठा लिया।जसवन्त की उम्र करीब चालीस साल की थी। छः फुट का हट्टा-कट्टा, तगड़ा और तंदुरुस्त आदमी। मैंने उसे कपड़े दिखाए और लहंगा-चोली सिलने को कहा। जसवन्त बोला, “ठीक है मैडम, लेकिन आपका नाप लेना पड़ेगा।”मैंने दूसरा ब्लाउज दिया तो उसने गुस्से भरी नज़रों से मुझे देखा।

“आपको आशुतोष ने ही भेजा है ना?”

मैंने कहा, “हाँ, उन्होंने ही भेजा है। तो क्या हुआ?” जसवन्त ने धीरे से कहा, “आशुतोष मेरा बहुत जिगरी दोस्त है। वो मुझे अपनी सारी बातें बताता है… उसमें आपका भी ज़िक्र था।

उसने आपको बताया नहीं कि नाप हम खुद लेते हैं?” उसकी आँखों में हवस भरी चमक थी। मैं समझ गई थी—आशुतोष ने हमारी चुदाई की बात जसवन्त को बता दी है, इसलिए वह इतना भाव खा रहा था।मैंने उसे ऊपर से नीचे तक देखा। तगड़ा बदन, मजबूत कंधे… मन में आया—क्यों न इसके साथ भी मज़े ले लिए जाएँ। मैं मुस्कुराई, “माफ़ कीजिएगा, मैं भूल गई थी। आप ही नाप ले लीजिए।”

जसवन्त भी मुस्कुराया, “चलिए अंदर, आपकी ले लेते हैं… नाप।”मैं उसके साथ दुकान के अंदर बने चैंबर में चली गई। दरवाज़े पर चिटकनी लगते ही चारों तरफ लगे शीशों में मेरी परछाईं दिखने लगी।

जसवन्त ने कहा, “मैडम, अपना पल्लू ज़रा हटाइए, हमें नाप लेनी है।” मैंने पल्लू हटा दिया। ब्लाउज में कसे हुए मेरे स्तन साफ़ दिख रहे थे।

उसने उन्हें घूरा और मुस्कुराते हुए बोला, “मैडम, आपका ब्लाउज काफ़ी टाइट है। इसमें आपको आराम नहीं मिलता होगा।”

“जी, थोड़ा टाइट हो गया है… शायद मोटी हो गई हूँ।”

“अब आए दिन आशुतोष के साथ मज़े करोगी तो यही होगा मैडम!”

उसकी बात सुनकर मैं शर्म से पानी-पानी हो गई। जसवन्त ने मुझे खड़ा किया और नाप लेना शुरू कर दिया। इस बहाने वह अच्छे से मुझे परख रहा था।

“हम्म… पसंद बढ़िया है आशुतोष की। बिल्कुल टॉप क्लास!” मैं चुप रही। उसने कमर में इंच टेप डाला और मुझे अपनी ओर खींच लिया। सटते ही उसके पजामे में कसा हुआ लंड मुझे महसूस हो गया।

हाय राम… आशुतोष भाई से भी बड़ा! फिर उसने मेरे नितंबों पर हाथ फेरा, “नीचे की भी नाप लेनी है। साड़ी में ठीक से नहीं आएगी।” मैं समझ गई उसका मतलब। मैंने साड़ी उतार दी और सिर्फ पेटीकोट-ब्लाउज में उसके सामने खड़ी हो गई। फिर से नाप लेते हुए वह बोला, “बड़ा मादक फिगर है आपका। लगता है आजकल पीछे बहुत मेहनत करनी पड़ रही है।”

“जी ऐसा कुछ नहीं है… बस ऐसे ही।” जसवन्त ने सीधा कहा, “मैडम, मुझे सब पता है कि करवा चौथ आपने कैसे और किसके साथ मनाया। इसलिए छिपाने का कोई फायदा नहीं।

यूँ तो हमने आपका हसीन जिस्म फोटो में देखा था, लेकिन जो मज़ा सामने से मिलकर लेने में है, वो और कहाँ?” मेरा दिल धड़क उठा। आशुतोष भाई ने मेरी सारी बातें बता दी थीं… मेरी प्राइवेट फ़ोटो भी दिखा दी थीं।

जसवन्त हर तरह से हॉट था। मैं उसके साथ लेटना चाहती थी, लेकिन मेरी बातें खुल जाने के बाद नाटक करने का कोई फायदा नहीं था। इस वक्त सेक्स करना खतरे से खाली भी नहीं था।

जसवन्त ने मुझे अपनी बाहों में भर लिया। उसने मुझे गले लगा लिया और मैं भी उससे चिपक गई। उसके बदन की भीनी खुशबू मेरी साँसों में समा रही थी। पेटीकोट-ब्लाउज में उसके साथ चिपकते हुए उसके पजामे का तनाव साफ़ महसूस हो रहा था। उसने मेरी पीठ पर हाथ फेरा, “मैडम, एक गुज़ारिश है आपसे…”

“जी कहिए?”

“आपके हुस्न को हमने फ़ोटो में बहुत देख लिया… अब सामने से देखने की ख्वाहिश है।” मैं उसकी गुज़ारिश का मतलब समझ रही थी। उसका बदन भी मुझे बहुत आकर्षक लग रहा था। मेरी सारी बातें वह पहले से जानता था… इसलिए मैंने हामी भर दी।

मेरी इजाज़त पाते ही जसवन्त ने मुझे एक काउंटर पर बिठा दिया और मेरे बाल खोल दिए। बाल खोलकर उसने मुझे पीछे की तरफ़ झुका दिया ताकि मैं हाथों से संतुलन बना सकूँ। फिर उसने मेरे ब्लाउज के हुक खोलने शुरू कर दिए। ब्लाउज उतारकर ब्रा पर आया और एक सेकंड में ही हुक खोल दिया। मुझे अर्धनग्न करके वह थोड़ा पीछे हटा और जी भरकर निहारने लगा।

मैंने पूछा, “क्या हुआ जसवन्त भाई? आपको अच्छा नहीं लगा क्या?”

वह पास आया, मेरे स्तन को हाथ में पकड़कर रगड़ने लगा, “अच्छा लगा मैडम… इसीलिए निहार रहा हूँ। खुदा ने बड़ी फ़ुरसत में आपको तराशा है।”

उसके उर्दू अल्फ़ाज़ मेरी उत्तेजना और बढ़ा रहे थे। मैंने शुक्रिया कहा तो उसने एक झटके में मुझे काउंटर से उतार दिया और नीचे बिठा दिया। मैं घुटनों पर उसके सामने थी। वह खड़ा था।

“अब थोड़ा मज़ा भी ले लेने दो मैडम…

आपके उरोज बेहद खूबसूरत लग रहे हैं। हम इन्हीं को चोदना चाहते हैं।”

यह कहकर उसने पजामा नीचे कर दिया। उसका तना हुआ लंड मेरे सामने आ गया।

आशुतोष भाई से भी बड़ा… और काफ़ी अजीब सा।

आगे का हिस्सा काफ़ी खुला हुआ था, आसपास बाल भी थे।

मैंने उसकी खुशबू ली, फिर अपने स्तनों को हाथों से ऊपर उठाया।

जसवन्त ने अपना लंड मेरे स्तनों पर रख दिया। मेरे अंदर सनसनी दौड़ गई।

उसने थूक कर मेरे स्तनों को गीला किया और फिर अपना लंड रगड़ने लगा।

मैं अपने हाथों से स्तनों को दबाए हुए थी और वह लगातार मेरी छाती पर अपना लंड रगड़ रहा था।

उसके अंडकोष मेरी छाती से टकरा-टकराकर थप-थप की आवाज़ कर रहे थे। वह मेरे स्तनों को चूत समझकर चोद रहा था। करीब पंद्रह मिनट बाद उसका लावा फूट पड़ा। गर्म, गाढ़ा वीर्य झटकों के साथ निकल रहा था। मेरे स्तन उसके वीर्य से गीले हो गए। उसकी खुशबू अलग ही थी… मुझमें उत्तेजना जगा रही थी।

मैं घुटनों पर बैठी थी, मेरे स्तन अभी भी उसके गर्म वीर्य से चमक रहे थे। जसवन्त हाँफ रहा था, लेकिन उसकी आँखों में अभी भी वही हवस भरी चमक थी। उसने अपना लंड मेरे स्तनों से हटाया तो वह अभी भी आधा कड़ा था, नसों से भरा हुआ और चमकता हुआ।

“मैडम… अभी तो शुरुआत हुई है,” उसने भारी आवाज़ में कहा। “आपके इन उरोजों ने मेरी आग और भड़का दी है। अब असली मज़ा लेना है।

”मैं उठने लगी थी कि उसने मुझे फिर से नीचे खींच लिया। इस बार उसने मुझे काउंटर के किनारे पर बैठाया, मेरी दोनों टाँगें फैला दीं। पेटीकोट ऊपर उठाकर उसने मेरे पैंटी को एक झटके में नीचे खींच लिया।

ठंडी हवा मेरे गीले योनि द्वार पर लगी तो मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।जसवन्त घुटनों के बल बैठ गया। उसने दोनों हाथों से मेरे जाँघों को और चौड़े किए, फिर अपनी जीभ सीधी मेरी चूत पर लगा दी।

“आह्ह… जसवन्त भाई…” मेरी साँस अटक गई। उसकी जीभ पहले धीरे-धीरे मेरे फटे हुए होठों को चाट रही थी, फिर अचानक अंदर घुस गई। वह मेरी चूत को चूस रहा था, चाट रहा था, और बीच-बीच में मेरे क्लिटोरिस को दाँतों से हल्के से काट रहा था। मैंने उसके बाल पकड़ लिए और उसकी सर को और अंदर दबा दिया।

“और… और अंदर… जीभ और गहराई में डालो…”

मैं कराह उठी।पंद्रह-बीस मिनट तक वह मुझे मुँह से ही चोदता रहा। मेरी योनि से पानी टपकने लगा था, जो उसकी दाढ़ी पर लग रहा था।

जब मैं लगभग चरम पर पहुँचने वाली थी, तो उसने अचानक मुँह हटा लिया।“अब मेरा नंबर,” उसने कहा और खड़ा हो गया। उसने अपना लंड फिर से कड़ा कर लिया था—अब पूरी तरह तना हुआ, आशुतोष से साफ़ लंबा और मोटा। सिर का खुला हुआ हिस्सा चमक रहा था। उसने मेरे पेटीकोट को पूरी तरह उतार दिया, मुझे काउंटर पर लिटा दिया। मेरी पीठ शीशे से सट गई। जसवन्त ने मेरे दोनों पैर अपने कंधों पर रख लिए। फिर उसने अपने लंड का सिर मेरी गीली चूत पर रखा और धीरे-धीरे धकेलना शुरू किया।

“उफ़्फ़… कितनी टाइट है अभी भी…”

उसने दांत भींचकर कहा। मैंने महसूस किया कि उसका मोटा लंड मेरी दीवारों को फाड़ता हुआ अंदर जा रहा है।

हर इंच के साथ मेरे अंदर दबाव बढ़ रहा था। जब पूरा अंदर तक घुस गया तो उसने एक पल रुककर मुझे साँस लेने दी, फिर धीरे-धीरे बाहर खींचा और फिर जोर से अंदर धकेल दिया।

“आह्ह… जसवन्त… और जोर से… हाँ बस ऐसे…” अब उसने रफ़्तार बढ़ा दी।

काउंटर पर मेरी पीठ ठोक रही थी, मेरे स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे। हर धक्के के साथ उसके अंडकोष मेरी गांड से टकराकर थप-थप की आवाज़ कर रहे थे। शीशों में हमारी तस्वीर साफ़ दिख रही थी—मेरे फैले हुए बाल, उसके पसीने से भीगे चेहरे, और उसके लंड का मेरे अंदर-बाहर होना।वह कभी झुककर मेरे स्तन चूसता, कभी मेरे होठों को चूमता। उसकी जीभ मेरे मुँह में घुस जाती और मैं उसे चूस लेती।

“तुम्हारी चूत आशुतोष से भी ज्यादा गरम और गीली है मैडम…

आज पूरा निचोड़ लूँगा,”

वह कराहते हुए बोल रहा था।मैंने अपने पैर उसके कमर के चारों ओर लपेट लिए और उसे और अंदर खींच लिया।

“चोदो… और गहरा… मेरी चूत फाड़ दो जसवन्त भाई…”

उसने मुद्रा बदली। उसने मुझे पलट दिया, पेट के बल लिटाया।

मेरे नितंब ऊपर उठाए और पीछे से घुस गया। इस एंगल में उसका लंड और भी गहरा लग रहा था। वह एक हाथ से मेरे बाल पकड़कर खींच रहा था, दूसरे हाथ से मेरे स्तन मसल रहा था। हर धक्के के साथ मेरी गांड उसकी जाँघों से टकरा रही थी।

“हाय राम… पीछे से और मज़ा आ रहा है…” मैं चीख उठी।

वह तेज़-तेज़ चोद रहा था। कमरे में सिर्फ हमारी कराहें, मांस की थप-थप और गीली चूत की चप-चप की आवाज़ें गूँज रही थीं। मेरे शरीर से पसीना बह रहा था, उसके भी। अचानक उसने मुझे फिर घुमाया, इस बार खड़ा करके दीवार से सटा दिया। एक टाँग ऊपर उठाई और खड़े-खड़े चोदने लगा। मेरे स्तन उसकी छाती से रगड़ खा रहे थे। उसने मेरी गर्दन चूसी, काटी।

“अब निकालूँगा… अंदर डालूँ?” उसने हाँफते हुए पूछा।

“हाँ… अंदर डाल दो… पूरा…” मैंने कराहते हुए कहा।

उसके धक्के और तेज़ हो गए। आखिरी कुछ जोरदार ठोकरों के साथ उसका शरीर अकड़ गया। गर्म वीर्य की धारें मेरे गर्भ में फूट पड़ीं। एक… दो… तीन… लगातार झटके। इतना गाढ़ा और इतना ज़्यादा कि मेरे अंदर से बाहर भी निकलने लगा। वह कुछ देर वैसे ही अंदर रहा, हाँफता हुआ। फिर धीरे-धीरे निकाला। उसका लंड अभी भी टपक रहा था, और मेरी चूत से उसका और मेरा मिला-जुला पानी टपक रहा था।

मैं अभी भी काँप रही थी। मेरे पैर काँप रहे थे और जसवन्त का गर्म वीर्य मेरे अंदर से धीरे-धीरे टपक रहा था। उसने मुझे बाहों में भर लिया, मेरे माथे पर हल्का चुंबन लिया और मेरे बालों को सहलाते हुए बोला—

“मैडम… आज तो आपने मुझे पागल ही बना दिया।”मैंने मुस्कुराते हुए अपने बिखरे बाल संभाले और पेटीकोट-ब्लाउज ठीक करने लगी।

जसवन्त भी अपना पजामा ऊपर खींच रहा था, लेकिन उसकी आँखों में अभी भी वही भूख बाकी थी।

अचानक उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और धीरे से कहा—

“सुनो मैडम… कल तक आपका ब्लाउज़ और लहंगा दोनों रेडी कर दूँगा। मैं खुद आपके घर आकर दे जाऊँगा।”उसकी आवाज़ में एक मादक इशारा था।

मैंने उसकी ओर देखा तो वह मुस्कुरा रहा था।“और घर में…” उसने मेरी कमर में हाथ डालते हुए फुसफुसाया, “घर पहुँचते ही तुम्हें फिर से नंगी करूँगा। बिस्तर पर लिटाकर घंटों घपाघप करूँगा। आज जितना चोदा, उससे दोगुना मज़ा दूँगा। तुम्हारी चूत को फिर से फाड़ दूँगा, समझी?”

मेरे शरीर में फिर से सिहरन दौड़ गई।

मैंने सिर्फ़ सिर हिलाया और धीरे से कहा—“ठीक है जसवन्त भाई… कल इंतज़ार रहेगा।”उसने मेरे होठों पर एक गहरा, लंबा चुंबन लिया, मेरी जीभ चूसी और फिर मुझे छोड़ दिया।

मैंने कपड़े ठीक किए, आईने में एक बार खुद को देखा—गाल लाल, होठ सूजे हुए, और गर्दन पर उसके काटने के निशान। फिर दुकान से निकलकर घर की ओर चल दी।रास्ते भर मेरे अंदर उसकी गर्माहट और उसके वादे गूँजते रहे—

“कल घर आकर… घंटों घपाघप…”

पाठक प्रतिक्रिया • Reader Confessions
2 प्रतिक्रियाएं (2 Confessions)
A
आलोक रंजन (Alok) सत्यापित पाठक
आज
दर्जी की दुकान में नाप लेने से शुरू होकर काउंटर पर जो हुआ... सचमुच बेहद सनसनीखेज दास्ताँ! जसवन्त का अंदाज़ और कामिनी जी की अदाएं लाजवाब हैं।
R
राजेश मल्होत्रा (Rajesh) सत्यापित पाठक
1 दिन पहले
शीशों के सामने काउंटर वाली वो चुदाई... क्या गजब का रोमांच पैदा करती है। कामिनी जी के हर शब्द में आग है!
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