जयपुर यात्रा — ट्रेन के कूपे में रात का सफर
CHAPTER 14 Jaipur Nights

जयपुर यात्रा — ट्रेन के कूपे में रात का सफर

Overnight Train to Jaipur: Sleeper Compartment Sins
"ट्रेन रात 11 बजे चली... अंधेरे में एक अनजाना हाथ और बदन में दौड़ती सिहरन।"
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मालदीव हनीमून से लौटे अभी सिर्फ़ दो दिन हुए थे। दीपक जयपुर अपने घर चला गया था और मैं आज रात की राजस्थानी एक्सप्रेस से उसके पास पहुँचने वाली थी। टिकट 2A का था, साइड अपर बर्थ। मैंने लाल जरी वाली साड़ी पहनी, अंदर सिर्फ़ एक पतली लेस वाली लाल पैंटी। ब्रा नहीं। हनीमून में दीपक ने मेरी चूचियाँ इतना चूसा था कि निप्पल अभी भी सूजे हुए थे, हर झटके में साड़ी से रगड़कर दर्द और मज़ा दोनों दे रहे थे।

ट्रेन रात 11 बजे चली। मेरा साइड अपर था, सामने वाला साइड लोअर एक लड़के ने लिया था—अमन, भोपाल का। वो मुझे देखते ही घूरने लगा। मैंने जान-बूझकर साड़ी का पल्लू नीचे रखा, चूचियों की गहरी क्लीवेज दिख रही थी।

रात के ढाई बजे थे। लाइट बंद थी। मैंने साड़ी घुटनों से बहुत ऊपर चढ़ा दी और एक टाँग साइड की तरफ़ लटका दी। मेरी चूत पर पतली पैंटी पूरी तरह गीली हो चुकी थी, बीच की लाइन साफ़ दिख रही थी। अमन ने अचानक लाइट जलाई। उसकी आँखें फट गईं। उसने तुरंत अपना ट्रैक पैंट में हाथ डालकर लौड़ा दबाना शुरू कर दिया। मैंने आँखें बंद कर लीं, पर होंठों पर मुस्कान थी।

तीन बजे के करीब उसने हिम्मत की। ऊपर चढ़ने के बहाने मेरी गांड पर हाथ रखकर चढ़ा। मैंने करवट बदली ताकि उसका हाथ और अंदर जाए। उसने कंबल के नीचे हाथ डाला और मेरी जाँघें सहलाने लगा। पाँच मिनट में उसकी दो उँगलियाँ पैंटी के किनारे से अंदर घुस गईं। मैंने हल्की सी सिसकारी ली। उसका लौड़ा मेरी जाँघ पर चुभ रहा था, 7-8 इंच का मोटा, हनीमून के बाद पहली बार किसी अनजान का इतना करीब।

अगले स्टेशन पर ट्रेन रुकी। ज्यादातर लोग सो रहे थे। वो नीचे उतरा, शायद मुठ मारने। दस मिनट बाद वापस आया तो उसकी आँखें लाल थीं। ट्रेन चली। मैंने पानी माँगा। बातें शुरू हुईं। उसने मूवी का बहाना बनाया। मैं उसके पास सरक गई। एक ही कंबल में। उसका लौड़ा मेरी गांड पर चुभ रहा था।

रात के साढ़े चार बजे थे। उसने कंबल के अंदर मेरी साड़ी-पेटीकोट कमर तक उठा दिया। मैंने पैंटी नीचे सरका दी। उसने अपना ट्रैक पैंट घुटनों तक खींचा। उसका मोटा, काला लौड़ा सीधा खड़ा था, सुपारा चमक रहा था। मैंने उसका लौड़ा हाथ में लिया—गर्म, सख़्त, नसें फूली हुई।

“धीरे से… कोई जाग न जाए,” मैंने फुसफुसाया।

“तेरी चूत देखकर अब रुक नहीं सकता रंडी,” वो दाँत पीसते हुए बोला।

अमन ने कंबल के अंदर मेरी साड़ी-पेटीकोट कमर तक उठा दिया। मैंने खुद पैंटी घुटनों तक लुढ़का दी। उसका मोटा लौड़ा मेरी गांड पर टकरा रहा था।

“कामिनी… तेरी चूत तो पहले से ही पानी-पानी है,” उसने फुसफुसाते हुए कहा और दो उँगलियाँ अंदर ठूँस दीं।

“हँ… हनीमून के बाद किसी ने छुआ ही नहीं था… आज तू छू ले जितना मन करे,” मैंने कराहते हुए जवाब दिया।

उसने मुझे घुटनों के बल कर दिया। मेरी गांड ऊपर। उसने दोनों चीड़ियाँ फैलाईं और जीभ से चूत के छेद पर ज़ोर से चाटा।

“आआह्ह… गंदा लड़का… पूरा चाट ले… दीपक भी ऐसा नहीं करता,” मैंने तकिए में मुँह दबाकर कहा।

फिर उसने अपना 8 इंच का मोटा, काला लौड़ा मेरी चूत पर रगड़ा। सुपारा चूत के मुँह पर टिका।

“बोल… डालूँ?”

“हाँ मादरचोद… पूरा अंदर पेल दे… आज तेरी रंडी बनकर चुदूँगी,” मैंने गांड पीछे करके खुद ही लौड़ा पकड़कर चूत पर सेट कर लिया।

एक झटका… पूरा लौड़ा अंदर तक।

“आआआह्ह्ह… मार डाला रे… कितना मोटा है तेरा!”

“ले साली… तेरी चूत तो अभी भी टाइट है… दीपक ने ठीक से चोदा भी नहीं क्या?” वो मेरे बाल पकड़कर पीछे से ज़ोर-ज़ोर से पेलने लगा। थप-थप-थप-थप…

“आह… आह… हाँ… दीपक का छोटा है… तेरा तो बच्चेदानी से टकरा रहा है… और ज़ोर से… फाड़ दे आज!”

दस मिनट तक कुत्ते स्टाइल में पेलता रहा। मेरी चूचियाँ झूल रही थीं। उसने एक हाथ से चूची पकड़कर मसलते हुए कहा,

“बोल… किसकी बीवी है तू?”

“दीपक की… पर आज रात तेरी रंडी हूँ… पेल… और ज़ोर से पेल!”

फिर उसने मुझे लिटाया, मेरी दोनों टाँगें कंधों पर रखीं। लौड़ा फिर अंदर।

“देख… तेरी मंगलसूत्र हिल रही है… पति का नाम लेते हुए चुद रही है तू,” वो हँसते हुए बोला।

“हँ… ले दीपक… देख तेरी बीवी किसी और के लौड़े से चुद रही है… आह… आह… बस… अब नहीं सहन होता… छूट रही हूँ!”

मेरी चूत ने इतना पानी छोड़ा कि कंबल पूरा भीग गया। उसने स्पीड और बढ़ा दी।

“मैं भी झड़ने वाला हूँ… कहाँ डालूँ?”

“अंदर… पूरा अंदर… आज तेरी रंडी बनकर तेरे बच्चे की माँ बन जाऊँगी!”

वो ज़ोर से चिल्लाया और मेरी बच्चेदानी में गर्म वीर्य की मोटी-मोटी धारें छोड़ दीं। मैंने उसकी कमर कसकर जकड़ ली।

दो मिनट बाद मैं ऊपर चढ़ गई। उसका लौड़ा अभी भी अंदर था।

“अब मेरी बारी… देख कितनी देर टिकता है तू,” मैंने कहा और रंडी की तरह उछलने लगी।

थप्पड़-थप्पड़-थप्पड़… मेरी गांड उसके जाँघों से टकरा रही थी।

“आह कामिनी… तेरी चूत तो लौड़े को चूस रही है… रुक मत…!”

“रुकूँगी नहीं… आज तेरे लौड़े का सारा रस निचोड़ लूँगी… बोल… अच्छी चुदक्कड़ है दीपक की बीवी?”

“हाँ रंडी… सबसे बेहतरीन… आह… फिर आ रहा हूँ!”

इस बार उसने मुझे नीचे गिराया, लौड़ा बाहर निकाला और मेरे मुँह में ठूँस दिया।

“चूस… पूरा पी जा…!”

मैंने ज़ोर-ज़ोर से चूसा। दो मिनट में उसका लौड़ा फड़फड़ा उठा और मेरे गले में मोटी-मोटी धारें छोड़ दीं। मैंने एक बूंद नहीं छोड़ी, सब निगल लिया।

अंत में मैं उसके सीने पर गिर पड़ी। दोनों हाँफ रहे थे।

“कैसा लगा दीपक की बीवी को चोदकर?” मैंने हँसते हुए पूछा।

“जिंदगी का सबसे बढ़िया चोद… अब हर बार जयपुर आऊँगा,” उसने मेरी गांड दबाते हुए कहा।

सुबह साढ़े छः बजे ट्रेन जयपुर पहुँची। मैंने साड़ी ठीक की, मंगलसूत्र सँभाला, लिपस्टिक लगाई। मेरी चूत से अभी भी उसका वीर्य टपक रहा था। प्लेटफ़ॉर्म पर दीपक मुझे लेने आया था।

मैंने मुस्कुराते हुए उसे गले लगाया।

“कैसी रही रात, जान?” उसने पूछा।

“बहुत अच्छी… बहुत थक गई हूँ,” मैंने कहा और उसका हाथ अपनी गांड पर रख दिया।

पाठक प्रतिक्रिया • Reader Confessions

कामिनी के नाम आपकी पाती

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2 प्रतिक्रियाएं (2 Confessions)
N
निखिल टंडन सत्यापित पाठक
2 दिन पहले
ऑफिस के बंद कांच के केबिन और रात का सन्नाटा... बहुत ही थ्रिलिंग और बोल्ड।
D
देवेंद्र सिंह सत्यापित पाठक
4 दिन पहले
बॉस की टेबल पर वो पल... सत्ता और समर्पण का शानदार मेल।
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