क्रिसमस की रात — गुप्ता जी और कामिनी
CHAPTER 12 Holiday Confessions

क्रिसमस की रात — गुप्ता जी और कामिनी

Yuletide Longing: Snow Outside, Fire Within
"क्रिसमस की रात थी... चारों तरफ़ बर्फ़ सी ठंडक थी, पर कमरे के भीतर तापमान बढ़ रहा था।"
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क्रिसमस की रात थी... चारों तरफ़ बर्फ़ सी ठंडक थी, घरों में लाइटें झिलमिला रही थीं, लोग अपने-अपने परिवार के साथ क्रिसमस मना रहे थे। लेकिन मैं अकेली थी। मेरा भांजा कहीं बाहर गया हुआ था, घर में सन्नाटा था। रात के दस बज चुके थे। मैंने लाल रंग की पतली सी सिल्क नाइटी पहनी थी जो मेरे बदन से चिपक कर मेरे उभारों को और भी उभार रही थी। अंदर कुछ नहीं पहना था – न ब्रा, न पैंटी। बस वो लाल नाइटी और मेरी तड़प।

अचानक दरवाज़े की घंटी बजी।

मैंने सोचा कौन होगा इतनी रात को? दरवाज़ा खोला तो सामने खड़ा था सांता क्लॉज़ – लाल कोट, लाल टोपी, सफ़ेद दाढ़ी, बड़ा सा थैला कंधे पर।

मैंने हैरानी से पूछा, “कौन…?”

वो भारी आवाज़ में बोला, “सांता क्लॉज़ हूँ बेटी… गिफ़्ट देने आया हूँ।”

तभी उसने अचानक अपने दोनों हाथ अपनी पतलून पर रखे और लंड को मसलते हुए बोला, “बहुत जोर से सुसु आई है… जल्दी!”

मैं हक्की-बक्की रह गई, पर दरवाज़ा और खोल दिया। वो तेज़ी से अंदर घुसा और बाथरूम की तरफ़ भागा।

कुछ देर बाद अंदर से आवाज़ आई, “अरे सुनो… ज़रा अंदर आओ ना… काम है… जल्दी!”

मैं हिचकिचाई, फिर भी चली गई। बाथरूम में वो खड़ा था, पतलून का नाड़ा खोलने की कोशिश कर रहा था।

बोला, “नाड़ा नहीं खुल रहा… ज़रा मदद करो ना बेटी…”

मैंने झुक कर नाड़ा पकड़ा, जैसे ही खींचा – पूरी पतलून नीचे लुढ़क गई।

और क्खड़ा था एक 8 इंच का मोटा, तगड़ा, तना हुआ लंड – नसें फूली हुईं, सुपारा लाल।

उसने फट से लंड पकड़ा और ज़ोर की पेशाब की धार छोड़ दी… गर्म-गर्म धार टाइल्स पर टकरा रही थी। मैं बस देखती रह गई।

पेशाब ख़त्म करके वो मुस्कुराया, “क्या देख रही हो?”

पेशाब ख़त्म होते ही उसने मेरा सिर पकड़ कर लंड मुँह पर रगड़ा, “अब चूस साली… पूरा गले तक उतार… क्रिसमस का असली तोहफ़ा है ये!”

वो हँसा, “तेरे लिए ही तो है री रंडी…”

मैं घुटनों पर बैठ गई – “उम्म्म्म्म्म… सांता जी… कितना मोटा है… मुँह फट जाएगा… आह्ह्ह पूरा अंदर… गला चोदो मेरा… हाँ ऐसे ही…”

वो बाल खींच-खींच कर मुँह चोदने लगा, “ले… ले… चूस ज़ोर से… जीभ से सुपारा चाट… अंडकोष मुँह में ले पूरी… आह्ह्ह साली क्या चूस रही है… लार टपका दे… तेरी ठोड़ी तक पहुँच गई… आज तेरा मुँह चूत बना दूँगा!”

बस फिर क्या था। मैं घुटनों पर बैठ गई और ना-जाने-पहचाने सांता के लंड को मुँह में लेकर चूसने लगी। दस मिनट तक मैंने उसे चूसा – जीभ से चाटा, गले तक उतारा, लार से तर-बतर कर दिया। वो मेरे बाल पकड़ कर मुँह चोद रहा था और दूसरा हाथ मेरी नाइटी के ऊपर से मेरे भारी बूब्स मसल रहा था। अचानक उसने नाइटी को दोनों हाथों से खींच कर फाड़ दिया – चटाक की आवाज़ के साथ कपड़ा दो टुकड़े हो गया। मैं बिलकुल नंगी हो गई।

मेरे बूब्स उछल कर बाहर आए। वो पागल होकर बोला, “मादरचोद… ये दूध तो रस से भरे आम हैं… ले चूसता हूँ!”

और एक बूब मुँह में लेकर जोर-जोर से चूसा, दाँत काटे, निप्पल खींचे। मैं चीखी, “आह्ह्ह्ह्ह… सांता जी… दाँत मत… दूध निकल जाएगा… चूसो… और जोर से… हाँ दूसरा भी… मसलो… दबा-दबा कर लाल कर दो आज मेरे बूब्स को!”

मुझे गोद में उठाया और सीधे बेडरूम में ले जाकर बिस्तर पर पटक दिया। मैंने तुरंत टांगें चौड़ी कर दीं। वो मेरा मुँह देख कर बोला, “अब मास्क उतारता हूँ…”

मास्क हटाया तो… ओह्ह्ह… सामने थे मेरे पड़ोस के गुप्ता अंकल! 60 साल के, पर लंड 25 साल के जवान जैसा।

मैं चौंकी, “गुप्ता जी… आप???”

वो हँसे, “हाँ मैं ही हूँ रंडी… तेरी इस मादा चूत पर कब से नज़र थी। आज तेरा भांजा बाहर गया था ना? मौक़ा देख कर सांता बन कर आ गया। सब पता है मुझे… तू और तेरा भांजा रोज़ चुदाई करते हो, पति-पत्नी की तरह रहते हो… कितनों के साथ चुदती है तू? एक नंबर की रंडी है तू!”

मैं – “आआह्ह्ह्ह… गुप्ता जी… हाँ वहीं… चूसो… जोर से… आह्ह्ह मादरचोद… जीभ अंदर… तीन उंगली डालो… फाड़ दो मेरी चूत… हाँ… मैं तेरी रंडी हूँ… चाटो… चाटो… और तेज़… वो जीभ से क्लिट पर वार करने लगा।

मैं पागल हो गई – “आआह्ह्ह्ह्ह… हाँ वहीं… चूसो क्लिट… जोर से… आह्ह्ह्ह्ह मादरचोद… जीभ अंदर तक… तीन उंगलियाँ डालो… फाड़ दो मेरी चूत… हाँ… तेज़… और तेज़… मैं तेरी रंडी हूँ… चाटो… चाटो… आह्ह्ह्ह्ह्ह…”

15 मिनट तक चाटते रहे। मैंने तीन बार झड़ लिया। हर बार चिल्लाई, “ले… पी मेरा पानी… पूरा पी जाओ… आह्ह्ह्ह्ह फिर आ रहा है… ले… ले… निगल जाओ… आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह!!!!”

मेरी चूत सूज कर लाल हो गई थी, रस की नदी बह रही थी।

तब उसने लंड पकड़ा और मेरी चूत पर रगड़ा – “अब तैयार है रंडी? ले रहा हूँ अंदर…”

मैंने टाँगें और चौड़ी कीं – “डालो सांता जी… फाड़ दो मेरी चूत… पूरा अंदर तक… मैं मर रही हूँ!”

एक ज़ोर का धक्का… सुपारा अंदर गया। मैं चीखी, “आआआह्ह्ह्ह्ह… मर गई… धीरे… बहुत मोटा है…”

वो रुका नहीं, पूरा लंड एक झटके में पेल दिया।

फिर शुरू हुआ असली खेल – 20 मिनट तक मिशनरी में पेलते रहे।

हर धक्के पर मैं चिल्लाती, “आह्ह्ह… और अंदर… हाँ… बच्चेदानी में लग रहा है… गुप्ता जी… नहीं सांता जी… और जोर से… फाड़ दो… रोज़ चोदना मुझे… आह्ह्ह्ह मेरे बूब्स दबाओ… निप्पल मरोड़ो… हाँ… मैं तेरी रखैल हूँ… चोद… चोद… मत रुकना!!!”

20 मिनट बाद वो लेट गए – “अब तू चढ़ रंडी… खुद कूद मेरे लंड पर!”

मैं उनके ऊपर चढ़ी। लंड चूत पर रखा, रगड़ा, फिर धम्म से बैठ गई।

“आआआह्ह्ह्ह्ह… पूरा पेट में घुस गया… अब मैं कूदती हूँ…”

और मैं उछलने लगी – ऊपर-नीचे, गोल-गोल। मेरे बूब्स उछल रहे थे।

वो नीचे से धक्के मार रहे थे – “हाँ कूद रंडी… ज़ोर से… तेरी गांड देख कितनी देसी माल लग रही है… ले मेरा लंड… पूरा निचोड़ ले… बोल कौन चोद रहा है तुझे?”

मैं – “तू… सिर्फ़ तू… आह्ह्ह्ह… मैं झड़ने वाली हूँ… ले… ले… आ गया… आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह!!!!”

मेरी चूत से फव्वारा छूटा, उनका लंड और पेट पूरा भीग गया। मैं काँप रही थी, पर वो नहीं रुके।

फिर उन्होंने मुझे घोड़ी बनाया। गांड ऊपर की, चूत पीछे से चमक रही थी।

वो पीछे आए, लंड चूत पर रगड़ा, फिर एक झटके में पूरा पेल दिया।

मैं चिल्लाई, “आआह्ह्ह्ह… गुप्ता जी… अब गांड मारो… दोनों छेद आज फाड़ दो!”

वो हँसे, “पहले चूत फाड़ूँ फिर गांड… ले रंडी… पीछे से… तेरी गांड कितनी रसीली है…”

और शुरू हो गए – फच-फच-फच-फच… कमरा सिर्फ़ चुदाई की आवाज़ों से गूँज रहा था।

हर धक्के पर मैं चीखती, “हाँ… और जोर से… गांड पर चपत मारो… हाँ… ठोको… मेरी चूत से झाग बन गया… देखो कितना सफ़ेद माल… आह्ह्ह्ह्ह… मैं फिर झड़ रही हूँ… ले… पीछे से नहला रही हूँ तेरा लंड… आह्ह्ह्ह्ह्ह!!!!”

लगातार 25 मिनट तक गांड मारते रहे। मेरी टाँगें काँपने लगीं, चूत से झाग और पानी की नदी बह रही थी।

आख़िर में वो बोले, “अब झड़ने वाला हूँ… तैयार है रंडी?”

मैंने मुँह खोल कर जीभ बाहर निकाल दी – “हाँ… मुँह में… बूब्स पर… पेट पर… जहाँ मन करे… अपना गाढ़ा माल उड़ेल दो… मैं सब चाट लूँगी!”

वो लंड निकाला और मेरे ऊपर खड़े हो गए।

पहली फुहार मेरे मुँह में, दूसरी बूब्स पर, तीसरी पेट पर… दस-बारह ज़ोर की पिचकारियाँ… जैसे ज्वालामुखी फट गया हो। गाढ़ा, गरम, बदबूदार वीर्य की बौछार…

मैंने उंगली से उठा-उठा कर चाटा और बोली, “गुप्ता जी… कितना माल था… सालों से जमा किया था क्या मेरे लिए… उम्म्म्म… सबसे स्वादिष्ट वीर्य है तुम्हारा…”

वो हाँफते हुए मेरी गांड पर ज़ोर की चपत मारकर बोले, “सिर्फ़ तेरे लिए जमा किया था रंडी… अब कपड़े पहनता हूँ… लेकिन याद रखना… जब भी घंटी बजेगी, चूत खोल कर तैयार रहना… तेरी चूत और गांड अब मेरी प्रॉपर्टी हैं!”

मैं नंगी ही दरवाज़े तक गई, उनका लंड चूमा और बोली, “जब मन करे तब आ जाना मालिक… आपकी रंडी हमेशा गीली और तैयार रहेगी…”

पाठक प्रतिक्रिया • Reader Confessions

कामिनी के नाम आपकी पाती

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2 प्रतिक्रियाएं (2 Confessions)
G
गौरव शर्मा सत्यापित पाठक
3 दिन पहले
गुलमर्ग की बर्फ और कमरे में जलती अंगीठी... बाहर शून्य तापमान और अंदर पिघलता बदन।
V
विनय प्रसाद सत्यापित पाठक
6 दिन पहले
गुप्ता जी और कश्मीरी शॉल का वो स्पर्श... बहुत ही नॉस्टैल्जिक और गर्म कहानी।
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