क्रिसमस का समय था। हवा में ठंडक थी और हर तरफ़ लाइटें जगमगा रही थीं। गायत्री ने मुझे अपने घर क्रिसमस पार्टी के लिए बुलाया था। मैं बहुत दिनों से निलेश पर फिदा थी – गायत्री का पति। लंबा, चौड़ा सीना, गहरी आवाज़... बस देखते ही मेरी चूत में सनसनी दौड़ जाती थी। इसीलिए मैंने आज लाल रंग की बेहद सेक्सी साड़ी पहनी थी – पतला ब्लाउज़, गहरी नेक, पीठ पूरी नंगी और साड़ी इतनी नीचे बांधी कि मेरी नाभि तक दिख रही थी।
कार पार्क करते ही गायत्री का फ़ोन आया।
"कामिनी यार, मैं ऑफ़िस में फंस गई हूँ। दो घंटे तो लग ही जाएंगे। निलेश और परम घर पर ही हैं, तू जाकर उनसे बातें कर ना। सॉरी यार!"
मेरा दिल ज़ोर से धड़कने लगा। दो घंटे? अकेले निलेश और परम के साथ? वाह... क्या मौक़ा मिला है भगवान!
मैं दरवाज़े पर पहुँची। घंटी बजाते ही निलेश ने दरवाज़ा खोला। सफ़ेद शर्ट, ग्रे ट्रैक... और उसकी मुस्कान देखकर मेरी टांगें काँपने लगीं।
"आओ कामिनी, गायत्री ने बताया था तुम आ रही हो।"
परम अपने कमरे में था। हम दोनों सोफ़े पर बैठ गए। बातें शुरू हुईं, लेकिन मैं जानबूझकर अपना पल्लू बार-बार सरकाती रही। कभी कॉफ़ी पीते हुए, कभी हँसते हुए। मेरा गहरा ब्लाउज़, क्रीम रंग की ब्रा... मेरे भरे-भरे स्तन लगभग बाहर झांकने लगे। निलेश की नज़रें बार-बार वहाँ टिक रही थीं।
फिर मैंने देखा – उसके ट्रैक में उभार साफ़ दिख रहा था। चड्डी नहीं पहनी थी उसने! पूरा आकार, पूरा तनाव... मानो कोई मोटा साँप अंदर कुलबुला रहा हो। मेरी चूत तुरंत गीली हो गई।
बातों-बातों में मैंने अपना हाथ उसके जाँघ पर रख दिया। फिर धीरे-धीरे ऊपर सरकाया। जैसे ही मेरी उंगलियाँ उसके लंड को छूईं, वो साँस रोककर मुझे देखने लगा। लेकिन हटाया नहीं। बल्कि उसने मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिए। गहरा, भूखा किस... जीभ अंदर, लार का आदान-प्रदान।
हम बेडरूम में घुसे तो निलेश ने दरवाज़ा अंदर से लॉक कर दिया। कमरे में सिर्फ़ एक हल्की सी लाल लाइट जल रही थी, क्रिसमस ट्री की झिलमिल बाहर से आ रही थी। उसने मुझे दीवार से सटा दिया और मेरे होंठों पर ऐसा किस किया कि मेरी साँसें रुक गईं। उसकी जीभ मेरे मुँह में घुसकर मेरी जीभ से खेल रही थी, लार का रस दोनों के मुँह में मिल रहा था।
मैंने उसकी शर्ट के बटन खोल दिए। उसका चौड़ा, बालों वाला सीना मेरे स्तनों से सटा हुआ था। उसने मेरी साड़ी का पल्लू एक झटके में नीचे गिरा दिया और ब्लाउज़ के हुक खोलकर मेरे 36D के स्तन बाहर निकाल लिए। मेरी क्रीम कलर की ब्रा ऊपर सरका दी और दोनों स्तनों को मुँह में लेकर चूसने लगा – पहले दायाँ, फिर बायाँ। निप्पल को दाँतों से काटता, खींचता, चूसता... मैंने उसकी पैंट की इलास्टिक पकड़ी और नीचे सरका दी। सच में चड्डी नहीं थी! उसका बारह इंच का मोटा, काला-लाल लंड सीधा खड़ा था, नसें फूली हुईं, सुपारा चमक रहा था, उसमें से प्री-कम की बूंदें टपक रही थीं।
मैं घुटनों पर बैठ गई। दोनों हाथों से उस लंड को पकड़ा – इतना मोटा था कि मेरी उंगलियाँ मिल नहीं रही थीं। मैंने जीभ से पहले सुपारे को चाटा, फिर पूरा मुँह में लिया। गले तक अंदर... वो मेरे सिर के बाल पकड़कर धक्के मारने लगा। "चूस कामिनी... पूरा गले में ले साली... हाँ ऐसे ही!" बीस मिनट तक उसने मेरा मुँह चोदा। मेरी लार उसके लंड से टपक रही थी, गले में खराश होने लगी थी, आँखों से पानी निकल रहा था, फिर भी मैं रुकना नहीं चाहती थी।
फिर उसने मुझे खड़ा किया, मेरी साड़ी-पेटीकोट सब नीचे गिरा दिया। सिर्फ़ ब्रा और पैंटी में मैं उसके सामने थी। उसने ब्रा भी फाड़ दी और पैंटी एक झटके में चूत पर से खींचकर फेंक दी। मैं पूरी नंगी थी। उसने मुझे बेड पर धकेल दिया और मेरी दोनों टांगें चौड़ी कर दीं। मेरी गुलाबी चूत पूरी तरह गीली थी, बाल साफ़ किए हुए थे। उसने अपना मुँह मेरी चूत पर रखा और जीभ अंदर तक घुसेड़ दी। क्लिटोरिस को चूसता, दाँतों से हल्का काटता, दो उंगलियाँ अंदर-बाहर करता रहा। साथ में मेरे स्तनों को इतना मसल रहा था कि निशान पड़ गए। मैं तड़प रही थी, कमर ऊपर उठा-उठाकर उसका मुँह अपनी चूत पर दबा रही थी। पंद्रह मिनट बाद मेरा पहला झड़न हुआ – फुहारें छूटने लगीं, मैं चीखी, "निलेश... बस... मर जाऊँगी... आह्ह्ह्ह्ह!"
उसने मुझे घोड़ी बनाया। मेरी गांड ऊपर की तरफ़ थी। उसने अपना बारह इंच का लौड़ा मेरी चूत पर रखा और एक ही झटके में आधा अंदर घुसेड़ दिया। मैं चीख पड़ी, "आआआह्ह्ह्ह मार डाला... फट गई चूत मेरी!" लेकिन वो नहीं रुका। धीरे-धीरे पूरा अंदर तक पेल दिया। फिर शुरू हुआ असली ठुकाई। ज़ोर-ज़ोर से, पूरी लंबाई बाहर निकालकर फिर पूरा अंदर। मेरी चूत से चिप-चिप की आवाज़ आ रही थी। वो मेरी गांड पर चपतें मार रहा था, बाल पकड़कर सिर पीछे खींच रहा था। मैं पागलों की तरह चिल्ला रही थी, "चोद निलेश... फाड़ दे मेरी चूत... हाँ ऐसे ही... और तेज़!"
ठीक उसी वक़्त दरवाज़ा खुला। परम खड़ा था – पूरी तरह नंगा। उसका आठ इंच का मोटा लंड हाथ में लिए हिल रहा था। वो मुस्कुराया और बोला,
"डैड, मुझे भी मौका दो ना...
निलेश हँसा, "आ जा बेटा... आज मिलकर इस रंडी को स्वर्ग दिखाते हैं!"
मेरे सामने आया और अपना लंड मेरे मुँह में ठूँस दिया। अब बाप पीछे से चोद रहा था, बेटा आगे से मुँह। दोनों के धक्कों से मेरा शरीर आगे-पीछे हिल रहा था। परम मेरे गले तक लंड डालकर मुँह चोद रहा था, निलेश चूत।
फिर उन्होंने पोज़िशन बदली। निलेश ने मेरी गांड में थूक लगाया और अपना मोटा सुपारा गांड के छेद पर रखा। मैं डर गई, "नहीं निलेश... गांड नहीं... बहुत बड़ा है!" लेकिन उसने एक जोर का धक्का मारा। आधा लंड अंदर चला गया। दर्द से मेरी आँखें फट गईं, मैं चीखी। लेकिन धीरे-धीरे मज़ा आने लगा। परम ने सामने से चूत में अपना लंड डाल दिया। अब दोनों एक साथ – बाप गांड मार रहा था, बेटा चूत। दोनों विपरीत लय में धक्के मार रहे थे, मैं बीच में पिस रही थी। मेरी चीखें पूरे कमरे में गूँज रही थीं, "बस करो... फट जाऊँगी... आह्ह्ह्ह येस्स्स... और ज़ोर से... दोनों मिलकर फाड़ दो मुझे!" दूसरा ऑर्गेज़म आया, मेरी चूत से पानी की फुहारें निकल रही थीं, गांड सिकुड़-सिकुड़ कर निलेश के लंड को जकड़ रही थी।
परम नीचे लेट गया। मैं उसके लंड पर बैठ गई – पूरा आठ इंच एकदम अंदर तक। मैं ऊपर-नीचे कूदने लगी, मेरे स्तन उछल रहे थे। निलेश पीछे से खड़ा हुआ और गांड में फिर से अपना बारह इंच का राक्षस घुसेड़ दिया। अब डबल पेनिट्रेशन ऊपर-नीचे। मैं पागल हो चुकी थी। दस मिनट बाद परम की साँसें तेज़ हुईं और उसने मेरी चूत के अंदर पूरा माल छोड़ दिया – गर्म, गाढ़ा वीर्य की बौछार। वो झड़कर ढीला पड़ गया।
निलेश ने मुझे उठाया, मिशनरी में लिटाया। मेरी दोनों टांगें अपने कंधों पर रखीं और फिर चोदना शुरू किया। पूरा लंड अंदर-बाहर, मेरी चूत की दीवारें खिंच रही थीं। वो मेरे स्तनों को चूस रहा था, निप्पल काट रहा था। बीस मिनट तक लगातार ठुकाई... मैंने तीन बार और झड़ा। आख़िर में वो बोला, "मुँह खोल साली!" उसने लंड निकाला और मेरे चेहरे पर, होंठों पर, मुँह में अपनी पिचकारी छोड़ दी। इतना सारा माल – जैसे कोई नल खुल गया हो! पूरा चेहरा, गला, स्तन – सब सफ़ेद हो गए। मैंने जीभ निकालकर सब चाट लिया, उंगलियों से इकट्ठा करके मुँह में डाला और निगल गई।
हम तीनों पसीने से तर थे। निलेश ने मुझे किस किया, स्तन दबाए और बोले, "तू गायत्री से भी ज़्यादा सेक्सी है कामिनी।"
फिर हमने कपड़े पहने और ड्रॉइंग रूम में बैठकर चाय पीने लगे – जैसे कुछ हुआ ही न हो।
ठीक पाँच मिनट बाद गायत्री आ गई।
"सॉरी यार देर हो गई!"
मैं मुस्कुराकर बोली, "कोई बात नहीं गायत्री... हमने तो ख़ूब एंजॉय किया।" मेरी चूत और गांड अभी भी दहक रही थीं, अंदर वीर्य भरा हुआ था। लेकिन दिल कह रहा था – बेस्ट क्रिसमस पार्टी एवर!
कामिनी के नाम आपकी पाती
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